तैत्तिरीयो पनिषाद | Taittiriyopnishad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(४)निःश्रेयसकी प्राप्तिका एकमात्र हेतु ज्ञान ही है। इसके डिये कोई अन्य साधन नहीं दै | मीमांसकोंके मतमें '“खर्ग! शब्दबाच्य निरतिशय प्रीति ( प्रेय ) ही मोक्ष है ओर उसकी प्राप्तिका साधन कर्म है | इस मतका भाचारयने बनेकों युक्तियोंसे खण्डन किया है ओर खर्ग तथा कम दोनोंह्वीकी अनित्यता पिद्ध की है।इस प्रकार आरम्म करके फिर इस वल्लोमें बतछायी हुई भिन्न- भिन्‍न उपासनादिकी संक्षिप्त व्याख्या करते हुए इसके ठपसंहारमें भी भगवान्‌ भाष्यकारने कुछ विशद विचार किया है | एकादश अनुवाकमें शिष्पको वेदका खाध्याय करानेके अनन्तर आचार्य सत्यमाषण एवं धर्माचरणादिका उपदेश करता है तथा समावर्तन संस्कारके बिये भादेश देते हुए उसे गृहस्थोचित कर्मोकी भी शिक्षा देता दै | वहाँ यह बतलाया गया दै कि देवकम, पितकर्म तथा अतिथिपूजनमें कभी प्रमाद न द्वोना चाहिये, दान और खाध्याय- में भी कभी भूछठ न होनी चाहिये, सदाचारकी रक्षाके छिये गुरुजनों- के प्रति श्रद्धा रखते हुए ढन्‍्द्दीके भाचरणोंका अनुकरण करना चाहिये--किंतु वह अनुकरण केबछ उनके सुझतोंका हो, दुष्क्र्तोका नहीं । इस प्रकार समस्त वर्लीमे ठपासना एवं गृहस्थजनोचित संदाचारका ही निरूपण होनेके कारण किसीको यह आशंका न हो जाय कि ये द्वी मोक्षके प्रधान साधन हैं इसलिये आचार्य फिर मीक्षके साक्षात्‌ु साधनका निर्णय करनेके डिये पाँच विकल्प करते हैं--( १) क्या परम श्रेयकी प्राप्ति केवढ कर्मसे हो सकती है ? (२) अथवा विद्याकी अपेक्षायुक्त कमंसे, (३) किवा कर्म और ज्ञानके समुच्यसे, ( ४ ) या करमकी अपेक्षाबाले ज्ञानसे, (७५) अथवा केवल ज्ञानसे १ इनमेंसे अन्य सब पक्षेको सदोष छिद्ध करते हुए आचायने यही निश्चय किया है कि केवल ज्ञान ही मोक्षका साक्षात्‌ साधन है ।इस प्रकार शीक्षावल्डीमें संहितादिविषयक उपासनाओंका निरूपण कर, फिर त्रह्मानन्दवल्लीमें अह्मविधाका वर्णन किया गया है । इसका




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