जैनेन्द्र की कहानियाँ | Jainandra Ki Kahaniya

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
शेयर जरूर करें
Jainandra Ki Kahaniya by जैनेन्द्र कुमार - Jainendra Kumar
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 754.23 MB
कुल पृष्ठ : 234
श्रेणी :
Edit Categories.


यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटी है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं |

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

जैनेन्द्र कुमार - Jainendra Kumar

जैनेन्द्र कुमार - Jainendra Kumar के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश (देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
क् परदेसी € बात कह दी है । चर तुम देख लो कि में भली नहीं हूँ । कुमार फिर मुमे नहीं मिला । न जाने वह कहाँ है । बटोही मुझे अकेलापन अच्छा नहीं लगता है । देखो परदेसी तुम्हें वस्ती के लोग यहाँ आने के कारण भला नहीं कहेंगे। मुझे वे बहुत खोटी-खोटी वातें कहते हैं । पर मैं नहीं चाहती कि तुम्हें भी कोई खोटी वात कहे । तुम परदेसी हो । तुम्हें लोगों की खोटी बात की परवाह न हो तो परदेसी तुम कुछ रोज़ यहाँ रहकर चले जाना । मेरा जी लग जायगा । यहाँ कौन कब ्ाता है ? पुरुष में सममा-- महिला तुम क्या समझे परदेसी और तुम चुप क्यों होगये पुरुप कुछ नहीं ।... देखो में प्रवासी हूँ । मुझको खरा-सरोटा नहीं छूता । म॑ यहाँ कुछ रोज़ रहूँगा । महिला परदेसी तुम किस देश के वासी हो ? तुम्हें खरा- खोटा नहीं छूता ? पुरुप मैं अनेक देश-देशान्तसों में घूमा हूँ । पर यह तुम लोगों का देश न्यारा है। और सब जगह तो ऐसे खरे-खोटे की वात नहीं है। भद्रे क्या तुमको पका मालूम है कि तुम खोटी हो ? महिला हाँ मैं ऐसा ही जानती हूँ। नहीं तो लोग मुभे क्यों दुरदुराते पुरुप एक और लोक भी दे । इस तुम्दारे लोक से वद्द अगला दे। वहाँ सब उलट जाता दै । जो यहाँ दुरदुराया जाता है वर्द उसका आाद्र होता है । यहाँ का दुखी वहाँ सुख पाता है । तुम उस लोक के वारे में कुछ नहीं जान ीं मदिला क्या परलोक ? पुरुष हाँ परलोक ।




  • User Reviews

    अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

    अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
    आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :