भर्तृहरि - शतक - त्रयम् | Bhartrihari Shatak Trayam

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Bhartrihari Shatak Trayam by भर्तृहरि - Bhartṛhari

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महाराज भर्तृहरि लगभग 0 विक्रमी संवत के काल के हैं
ये महाराज विक्रमादित्य के बड़े भाई थे और पत्नी के विश्वासघात
के कारण इनमे वैराग्य उत्पन्न हुआ

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्छ भर्दृदरिकृत -शतफप्रयम्‌विधाके विषय है, तब तो इनके संबंधके मेरे हार्दिक और आल्िऊ ममत्वभावका और मी प्रगाद और ग्रशज़तर होना खाद्मारिक ही है । और इस हिये इनके विषय बुछ भषिक परिचयात्मक शब्द लिखनेमें मेरा मन संकोचका अनुभव करे यह भी आलुपंगिक है।मुन्ने यह उछ्ेख करते हुए दुःख द्ोता है कि-मेरे परम मित्र थी धर्मान्दजी, जिन्होंने ही आ कर, कोई ४ वर्ष पहले, मुप्ते अपने प्रिय पुत्र बाबाके भर्तृहरिके सुभाषित संग्रहक़ा झुसंशोवित - सुसपादित सस्फरणके तैयार करनेमे व्यस्त रहनेकी सूचना दी थी और जिन्होंने ही वाबाके इस कामओ्रे अपनी इस प्रत्थमाठा द्वार प्रकाशित करनेकी प्रेरणा की थी, वे भाज इस लोकमें नहीं हैं और अपने पुत्रके संस्कषत-साहिह्यविषयक कार्यका यह सुफ़ठ अपने चर्मचक्षुसे देखनेको उपस्थित नहीं हैं |दिवंगत श्री धमीनन्‍्दजीके विषयमें यद उठेख करते हुए मुझे उनके सापके मेरे दीर्पकाठीन ख्षेह्ामक संबन्‍्धकी इप्पत्मृति गेरी आखोंके सामने मा कर खडी हो जाती दे और मेरे हदयकों गदगदित कर देती है।बौद्ध धर्मके सिद्धान्त और संघका स्ग्रपम परिचय सुने थी धर्मानन्दजीके लेखों द्वारा ही परत था था। उनकी तिखी हुई 'ौद्धपर्म आणि संघः तथा “बुद्धलीलासारसंग्रह नामक दो मराठी पुस्तकें पढ़ कर मैंने अपनी तद्रिपयक जिज्ञासा का आविभीव अनुभूत किया। प्रसंगवश, मनोरंजन कार्यीज्य दवाग्र प्रकाशित उनका आत्मनिवेदन' मुझे पदनेको बिल और उप्तमें उनके ऋन्‍्तिमप जीवनकी विविध अवस्थाओं और घटनाओंकों पढ़ कर मैं छुग्घ-सा हो गया | मैंने उनके जीयनमें और समावमें, अपने ही जीवनके और सभावक्रे कुछ पिरिष्ट समान चित्र देखे और प्रा मत उनके प्रति भादरके साथ आकृष्ट इआ | परंतु जिम्त अवस्थामें मैंने उनकी वे पुरुकें पढ़ी पी और जिस अवसथामे ने उस समय थे - वे दोनों अवस्थाएँ वैसी विरेधात्मक थीं कि उनमे साथ जीवनमें मेरा कभी साक्षात्परिचय दोनेकी कोई संभावना ही नहीं की जा सकती थी।विधिके नियोगसे में, १९२० में, मदवत्मा-गान्धीजी द्वारा आ्रारन्ध असहकार आन्दोठवका ५क अतुचर बन गया और मदात्माजीके आदेशसे अहमदाबादमें स्थापित होनेवाले गुजरात रियापीठके पक विश्वि्ट अन्‍्ययन मन्दिरका अध्यक्ष बन गया | विद्यापीठने मेरे तत्त्वावधानमें, भारतीय आचीन साहिल, इतिहास, त्ज्ञान, माषाबिज्ञन आदिके अध्ययन, अन्वेषण, संशोधन, संपादन भादि कार्य निभित्त गुजरात धरावच मन्दिर नामक एक विशिष्ट संस्वाकी स्थापना की । उसमें संछत, प्राइन, देशय भाषा आदिके विविध अकारके गाजोका अध्ययन-अध्यापन करने- करानेडी व्यवस्था की गयी। योगालुपोगसे, श्री धर्मानन्‍्दजीका, अमेरिकाकी हाई युनितर्सिटीमें जपना कार समान का, देशों आगा हुआ | औ काऊ़ा सादव कालेटकर की ग्रेरणासे उन्होंने पुरातत्व मन्दिसों अध्यापक चननेका और प्राडी वाद्ययका अययंन करानेके असनका खीकार किया। उसी दिनसे दम दोनों परस्पर समानप्रहतिक एवं समानधर्मा, सहचारी राखा बने | उसके बाद, उनके मी अनेक स्थान-परिवर्तन हुए और मेरे मी कई इए। परंत इमारा सौद्षार्दसंत्ंध




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