काव्य में उदात्त तत्त्व | Kavya Men Udatt Tatttv

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ल्‍्र४ काव्य में उदात्त तत्त्व * या उसका अंग ऐता नहीं है जो वर्तमान मान्यताओ्रों के विरुद्ध या उससे भिन्न हो। उपयुक्तता और श्रौचित्य के श्रनिवार्य महत्त्व के कारण पहले कुछ शंका होती तो है किन्तु बाद में विचार करने पर उसका समाधान हो जाता है क्योंकि आखिर औचित्य भर उपयुक्तता का तिरस्कार तो किसी भी उत्कृष्ठ काव्य-शैली में सम्भव नहीं । इनके अ्रभाव में तो, जैसा कि स्वयं लेखक ने उदाहरण देकर विस्तार से समझाया है, उदात्त उपहास्य होकर रह जाता है । आऔचित्य और उपयुक्तता का प्रयोग लेखक ने रूढ़ि के रूप में -नहीं किया--- ओऔचित्य से यहाँ शैली और परिस्थिति, उद्देश्य आदि के बीच श्रांतरिक सामंजस्य का ही अभिप्राय है; इसी प्रकार उपयुक्त शब्द-प्रयोग का श्रथे है ऐसे शब्द का प्रयोग जिसके साथ वक्ता या लेखक का 'प्रबल मानसिक संसर्ग हो । इसी प्रकार अलंकार-योजना के विषय में यद्यपि उन्होंने समुचित” विशेषण का प्रयोग किया है, किन्तु यहाँ भी समुचित का अर्थ न तो परम्परा-रूढ़ है भौर न वह संकीर्ण अर्थ में संतुलित का ही वाचक है। उदात्त शैली के शोभाकारक जिन धर्मों का विवेचन उन्होंने किया है वे प्रायः सभी श्रतिशयमूलक हैं जिनमें कल्पना के विस्तार और उत्तेजना की अपेक्षा रहती है--विस्तारणा, सार भादि में कल्पना के विस्तार की और शपथोक्ति, प्रश्तालंकार, छिन्नवाक्य, पुनरावृत्ति झ्रादि में उत्तेजना की। अतः श्रौचित्य और उपयुक्तता का सम्बन्ध शेली के आंतरिक उत्कषे से ही है, ये शब्द उसकी बहिरंग परिशुद्धता मात्र के द्योतक नहीं हैं, ओर इसका शअ्तक्य प्रमाण है लोंगिनुस का निम्नोद्धृत वाक्य : जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं यह बात अच्छी तरह जानता हूँ कि महानू प्रतिभा, निर्दोषता से बहुत दूर होती है: क्‍योंकि सर्वाज्भजीण परिशुद्धता में श्रतिवार्यतः क्षुद्रता की झ्ाशंका रहती है, श्र औदात्त्य में, जैसा कि विपुल सौभाग्य में भी होता है, कुछ न कुछ छिद्र भ्रवश्य रह जाते हैं ।”* इस प्रकार लोंगिनुस का ओऔचित्य महानु का ही अंग है, वह शुद्ध का वाचक नहीं है, ग्रतः उदात्त के साथ उसकी कोई भ्रसंगति नहीं माननी चाहिए । भारतीय वाइमय में उदात्त की परिकल्पना का अभाव नहीं है। भारतीय दर्शन में भगवानु के विराटू रूप की कल्पना और भारतीय काव्य में वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भवभूति आदि के भ्रनेक वर्णन उदात्त के भव्य निदर्शन हैं । वस्तुतः भारतीय शब्द विराट उदात्त की समग्र धारणा को व्यक्त करने में अधिक समर्थ है : गीता में प्रदर्शित भगवान्‌ के 'विराट रूप” (६ १।९--४४) से १. काव्य में उदात्त तत्त्व, एष्ठ ६६।




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