योगमार्ग प्रकाशिका | Yog Marg Prakashika

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Yog Marg Prakashika by खेमराज श्री कृष्णदास - Khemraj Shri Krishnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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1 ॥ क्ज म्छ भूमिका। . ह >आकनदपप पक कलर रे हि इस संसारावेयें मौक्षके देत अनेक उपाय हैं परंच समसते शफ्तिलिकि, ० मूल योगाभ्यासहै क्योंकि विना चित्तकी एकायता हुये कोई सॉंधन-टीर्के नहीं सो चित्तकी एकाग्रता विना योगाभ्यासके नहीं हेविंहे सो वार्ततो गीताजीमे कहीहे “चंच्छ हि मन; कृष्ण प्रमाये वलवदृढम?ः अथ-हे श्रीकृष्ण हीति निश्रय करके मन अत्यंत चंचल वा बलवान है विस कारण मनके निरोध करनेमें केष्छ एक योगही श्रेध्ठवर उपाय है अन्य नहीं सो वाता योगसूत्र्म कथन करी है“योगश्चित्तब्ृत्तिनिरोध।” चित्तकी वृत्तियोंका निरोध होना यही मुरूष योगका लक्षण तथा श्रीकृष्ण भगवान्ले गीतामें भजनके प्रति कहा है“तपस्विभ्योड्विको योगी ज्ञानिभ्योडपि मतोष$धिकः ॥ कर्मिम्यश्वाधिको योगीतस्मायोगी भवाशुनअर्थ-है अज्न तपस्वीते वा ज्ञानीते वा करम्मोंते योगामभ्यास्री सबसे ही श्रेष्ठ दे ताते तू योग कर, योगके सह अन्य नहीं । इति इससे योग संदेव सेवन करने योग्य है ऋह्मा विष्णु मदेशादिक जो बड़े बड़े महापुरुप हैं वा अन्य जद्पि लोग सो सब केयछ योगके द्वारा सिद्धिकूं म्राप्त इुये है सो थाता पेद 7 झा्र वा पुराणोंमें प्रसिद्ध है हम कहांतक वर्णन करें । अब आजकल प्रायः मनुष्य केवल नाकपर हाथ छूदेनेकीही योग वा आणायाम समझते हैं इससे जप तप आसन प्राणायाम सिद्धि कहांसति प्राप्ति हो और आ्राह्मण- त्व क्षत्रियत्व होना तो चढुतही सुशकिल है इसी हेतु नास्तिक लोग असिद्ध वथा पोप ऐसे नि्य चचन कहते है यदि जाने तो मत्यक्ष सिद्धि द्वारा उनके मुख तोड आप अपनेकूं कृतार्थ समझे और योगके अंथ तो बहुत हैं परंच उन सर्बोका सार सार श्रीमन्मद्वाराजाथिराज भीसवाई महेंद्रमतापरसिंह बहाडुर दीकम गढ़की आज्ञानुसार औ्रमत्परमहंस परित्ता- जकाचाये औ १०८ नृहरसिंदशासजी वा ओऔमन्महंत वेदांतब््य भी १०८ स्वामी अयोध्यादासजीकी शिक्षानुसार योगक्रिया सीखकर यह योग अँथ श्रीमत्परमहंस श्रीमहान्‌ जुगलदासजीने बनाकर प्रकाशित किया भाषानुवाद सद्दित जो इसमें म्रछ वा लशुद्धि दो सो सब सजन जनोकूं निवेदन है कि क्ृपाकर सुधार देंवें । आपका-कपापात्र श्रीमत्परमदँस श्रीयुत जुगलदास स्थान टीकमगढ़जुगलनिवास वांग मंदि्रि,




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