लघुसिद्धान्तकौमुदी | Laghusiddhantakoumudi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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संज्ञा)्रकरणम्‌ । श्५ ( ताल्वादिपु सभागेपु स्थानेष्बधोभागे निष्पन्नोड्यू अनुदात्तसंज्ञः स्यात्‌। ) ( स्वरितरसंज्ञायूत्रम ) / &समाहारः स्वस्तिः' | १।२। ३१ ॥ (उदात्तानुदात्तत्वे वणेघर्मों समाहियेते यत्र सोच स्व॒रितसंज्ञः स्यात्‌ |) ( अचामनुनासिकनिरनुनासिकमेदेन पुनदवविध्यप्रतिपादनम्‌ ) स नवविधोडपि प्त्येकमनुनासिकाननुनासिकत्वाम्यां द्विधा । ( अनुनासिकसंज्ञासत्रम्‌ ) _९./सुल्लनासिकावचनो >मुखनासिकावचनो5नुनासिक:' | १ । १।८॥ मुबसद्ितनासिकयोच्रायमाणो वर्णाउनुनासिकसंकज्ञ: स्थात्‌ नमन ७ नीचेरिति--( नीचे: ) कण्ठ ताड॒ आदि रुखण्ड स्थानों के नीचे के भाग से जिस अच्‌ का उच्चारण होता है वह ( अनुद्यत्तः ) अनुदात्त होता है | ८ समाहार इति--( समाहारः ) उदात्तत्व और अनुदात्तत्व दोनों धर्मों का मेल जिस वर्ण में हो वह ( स्व॒रितः ) स्त्ररित होता है अर्थात्‌ ताड आदि स्थानों के भध्यमाग से जिस अच्‌ का उच्चारण होता है उसे स्वशित! कहते हैं | उदात्त, अनुदात्त और स्व॒रित के उठाहरण वेद में आते हैं, वहीं उनका उपयोग भी है । यहाँ उपयोग न होने पर भी इन्हें याद कर लेना चाहिये। आगे 'स्वरप्रकरण” में उनका उपयोग सिद्ध होगा। छघुकौमुदी में तो “स्व॒रप्रकरण' है ही नहीं | स इति--( सः ) वह अच ( नवविधो5पि ) नवों प्रकार का ( मत्येकम्‌ ) प्रत्येक ( अनुनासिकाननुनासिकलाम्याम्‌ ) अनुनासिक और अननुनासिक भेद से ( द्विधा ) दो सरकार का होता हे ! है है ९, मुखनासिकेति - ( मुखसहितनासिकया ) मुख के नासिका से ( उच्चारयमाणों वर्ण: ) बोला जा रहा वर्ण ( अनुनासिकर्संकज्ञ: स्वात्‌ ) अछु- नासिक संज्ञावाला ही । , विद कक अर्थात्‌ जिसवर्ण का उद्यारण नासिका से होता दे उसे अनुनासिक! कहते हैं ।




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