पुरुषार्थ - चतुष्टय | Purusharth - Chatushtay

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Purusharth - Chatushtay by प्रेमवल्लभ त्रिपाठी - Premvallabh Tripathi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अअिन्थन कलियुगके प्रारम्भ ल्लोते ह्ली मह्नर्षि वेद-ठ्यासको यह्ल खिण्डिमघोष करना पछा +कि-- ( (९ को + ९ ८ ० ३5 कि ऊध्वबाहुविरोस्थपय न हि कश्चिच्छुणोति मे। ९5 ए आओ ४ घमोदथश्च कामश्व स॒ किमय न सेव्यते ॥ पष्ठ है कि तबसे ही धर्मका ह्वास प्रारम्भ ह्ञो गया था । धर्म ओर समाजका परस्पर अद्दगठ सम्बन्ध है। वस्तुत: समाज घर्माचरणपर ही अचकम्बित है । अत समाज 'बियछा तो मनुष्य क्यों झुघधरेगा ? और मनुष्यका सुधार न ह्ो तो समाजका सुधार कसे ? मह्ात्ति व्यास मगवान्‌के अज्ञावतार थे। वे निर्शिचितरूपसे त्रिकालज्ञ थे। भ्रूत+ भविष्य और वर्तमानको हरतामऊकवत्‌ जानने वाले थे और सब लोकोका ज्ञान रखते थे। मह्लाभारतमे क्या छुआ क्या नही छुआ, केसे समय-समथपर घमावपरीत और बीभत्स घटनाएँ छुड्ढें ? मीष्म-ब्रोण भादिके समक्ष मरीसमभामे रुकवन्त्रा द्रौपदीका वसच्त्राकषण+ अजद््वत्थामाद्वारा पाण्छवोके सोये हुए नालकोकी हत्या और उत्तराके गर्भस्थ शिक्षुक्े बधका' प्रयास - ये तोन जघन्यथतम अपराध हुए और कैसे घमकी उपेक्षा को गयी--यह् सब देखकर मह्वर्षि व्यासजी अधर्माचरणको विभीषिकासे सिल्वर गये । उन्हें महाती वेदना हुई 1कि कालिके प्रारम्ममे ढी यह्वष दुढंगा है तो भागे क्‍या होगा ? यह्नी भयका कम्पन उनके ठपर्यक्त इलोकमे मुर्त है । इसी वेद्नाकी भाह्ञ ऊपरके इोकसे फूल रह्ढी है । मह्लर्षि व्यासको जो आठाड़ा थी, वह्ल भाज समाजमे प्रत्यक्ष है । वर्तमान समयमे सर्वत्र, जीवनके समी क्षेत्रोमे उच्छु्डू ऊता, उद्दण्डता, अ्ष्टाचार; कुटपाठ, चोरी-छकेती ड्ुत्यादिका नोलनाका है | हमारा जो नेतिक, चारित्रिक क्वास स्वतन्त्रता-प्रातिके ३३ वर्ष्षके भीतर हुआ; वह्ठ बहुत ही अशुभ ह्ै--बहुत ही ज्ञोचनीय




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