मास्टर खेलाडीलाल एंड सन्स | Master Kheladilal And Sons

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Book Image : मास्टर खेलाडीलाल एंड सन्स  - Master Kheladilal And Sons
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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#ऋब५, कल,.... यद्यपि मेरे सहश अल्पज्ञ और अपुण्यकर्म्मा के लिए ऐसे पवित्र कीर्ति- 1. शाली रुत्कबि के स्तवनीय अज्ञरों पर लेखनो उठाने का साहस करना ही का उपहासालद और असम्नव था, तथापव जिव परमादार अन्तःकरणु« बाले, कारशणिक-शिरोमणि ने मुझ पंणगु पर निष्कारण ही करुणाद्र है छात्रा- बस्था में ही मुझे इस अछ्ू त और सुदुलभ प्रन्थरत्न का जीणेद्धार रूप सेवा के लिए प्ररित कर ऐसे अवोग्य प्राइृत शिशु पर भी वाहत्सल्य प्रकट किया, उस कॉपीनमात्र परिकरवाले अचिन्त्यानन्तकरुणाशक्तिशाली 'दिगम्बर' का में जन्म-अन्मान्तर से ही ऋचणोी हूँ । ; साथ ही साथ जिन उदारचेता मंहानुभावों की सद्भावना सेएु इस पुनोः् में उत्करिठत, प्रदत्त एवं सफल 2 मई व उन. सत्कीसिशाली दे। सहृदय और मान्यवरों के श्रद्धाललि समर्पण किये से नहीं रहा जाता |द्विवेदी, जिनके सरस्वती! पत्र में प्रकाशित अतीव हृदयाकषक उद्दाम लेखों ने ही मुझे सवप्रथम इस ग्रन्थरतन के समास्वादन के लिए. तथा बिना परिचय के जिन्होंने ऐसे अयोग्य शिशु की त्रटिपूर्ण, प्राथमिकीपुस्तक धंदान कर आथ्िक सहायता में म पं नहीं होने दिया ; अथवा यों कहना चाहिए _सम्पत्ति-विहीन शिशु से इसका निर्विन्न सम अवलम्बन के समाश्रयण का फसनामधन्य, प्रात:स्मरणीय, आचाय पं० महावीरप्रसादजी+ ज्ञालायित कर इन अक्षर-रत्नों पर लेखनी उठाने के लिए उत्कश्ठित किया; |- कृति के हृदय से अपनाकर इसके प्रकाशन में सहायता का उद्योग करने में के ० है - कष्ट उठाया। और द्वितीय महानुभाव हैं ज्भातरज्ञ*-निवासी पूज्ययाद यूं गड़ाशड्र जी मिश्र एम० ए० (1॥9बवंका ० फिस्पश्ा88 ते ०३ मु हे रा पमारएआंए) महोदय, जिन्होंने इस काय के लिए आंरम्म से ही अपनी:




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