श्रावकाचार | Shrawakachar

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Shrawakachar by पण्डित भागचन्द्र जी - Pandit Bhagachandra Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ग्रंथकत्ता । >०+*$<%*&०- इस ग्रंयके मूल कन्तो माथुरसंघके आचार्य जमितगति हैं। उक्त नामके दो आचार्य हुये हैं। जिनमेसे एक तो मुतराजाके श्रासनकाल विक्रमसंवतकी 9१ वीं शताब्दीमें । जिन्होंने धर्मपरीक्षा, सुभाषितरत्नसदोह, पंचर्सह तथा इस श्रावकाचार आदि अंथोकी रचना की है। ये अमितगति साधुरस- अरे खाचार्य माधवसेनके शिष्य थे इसवातका उल्लेख उक्त आचार्यश्रवरने प्रायः अपने सभी संधि किया है। इनकी विशेष अ्र्मस्तिका वर्णन सुमापितरत्न्स- दोह, आदि प्रायः सभी ग्रंथों मे है। इसलिए जिज्लासु महदी दयोंकों वहांसे जानना चाहिये यहाँ विस्तारके भयसे और सुभाषितरत्नसद्दी४हमें प्रशस्तिके सुर्द्ित झोजानेसे विशेष वर्णन नहीं किया मया है । दूसरे भमितगति आचार्य इन्हीं आमतगाती रे गुरुके गुरु भाचार्य मैमिपरेणके गुर तथा देवसेनके शिष्य हुये हैं! श्योगसार नामक जो अमितगति हंत अध्यास्मविषयक मंध है उसके कर्ता शायद ये ही अमितगति हैं। क्योंकि योग' सारकी शंड्दार्थरचना तथा धर्मपरीक्षादि मर्धोंफी रचनामें विभिन्नताके अति- रिक्त एक पुष्ट धमाण यह मी है हर धर्मपरीक्षादि अंथोर्मे माघवसेनके शिष्य अमितातिने अपने नामका उल्लेख भायः सभी अध्यायों पारच्छेेंके अम्तमे अन्य दॉड्दोकि विशेषणरूपमें किया है। परन्तु योगसारके किसी अधिकारमें ऐसा नहीं है, सिर्फ एक अंतिम को कमें भपना नाम स्पष्ट ध्रम्ट कियाहै >--जैसे:-- हटना सर्च गगननगरध्यप्रमायोपमान निःसंगात्मामितगतिरिदें भाभूतं योगसारम्‌ । प्रह्मणास्या परमझन स्वेधु चान्मप्रतिषठं निम्यानंद गालितकछिणं सुश्ममत्यशक्षछधक्ष्यम्‌ ॥ * झतिरिक्त धर्मपरीक्षादि सभी प्रधोंमें अम्रितगातिने अपने शुरुका स्मरण टिया हैं परन्तु योगसारमें म्दी। इसक्िये योगसारके कर्ता देव शिच्य भपितगति ही होने चाहिये ।




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