श्रीसघ्ङपट्टकः | Shrisangpattak

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Shrisangpattak by आचार्य श्री जिनचन्द्र सूरी जी - Aachary Shri Jinachandra Suri Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जज स्यास्पा--नियोहा० ॥ यत-पस्मास्कारणात्‌ एगविघा जना एबबिर् गुरु देवेम्पोपपिकमरयन्ति संत मदहता-अपरतस्प मोइस्प-मोइनीयकर्मणो मुम्मित- भदास्म्यप््‌ | छृपम्भूत गुरु ! निर्वाहार्धिन-निर्बाइस्प-उद्रमभरणस्पार्थितम्‌। पुना छविम्पूतम्‌* युपछवैः-मुणछेशै उन््रित-रपक्तम्‌। धुनः ढिम्धूतम्‌ मश्ञावज्षीठान्यपम्ू- अद्वात छोरम-आदार। अन्द्रयभ्ध-हुर्ले यस्य स (हम्‌।) पुना किम्पूतम्‌ ताइ गबणशम शह्ुणेन गुरुणा फिप्पतुरपाध्ताताविबशेन एद्भुगेन-प्धिप्यहुस्पगुणेन एवविघेन गुरुमा स्‍्त्रा पॉप-स्पोद्रमरणाप ध्वुण्डीकृत ताइकताइश्मेब घुम्दयते | कपम्भूता खना। बिफ्यात गृणान्वया अपि बिस्म्पाता।-प्रस्तिद्धा! गुणान्वयों बश्चों येपां ते समुणा।-झुझुलोस्पन्ना अपि | पुनः किम्मूताः ! सप्रोग्रगच्छप्रदा), छप्त उप्रः-उस्कटो गच्छग्रशो येषां ते ॥ १३॥ पुनरप्पेतवृद्वारमाइ-- दुष्मापा शुझुकर्म सशययबतों समर्मपुद्धिनूणां, रूादायासपि दुर्दप। शुपगुरु) प्राप्तः स पुष्पेम गेतू कसु मर स्वष्टित तथा5प्यलममी गइछतस्पिठिम्पाहवा), के हुमा कमिशाभ्रयेमदि कमाराष्येम कि कुर्मशे ॥ १४॥ ब्यायया--धुष्प्रापा० ॥ गुरुझमसबपकसां-गुरुकरमस्पूदगर्तां तृणां सदर्म पृद्धि।-प्रधानधर्मयृद्धि दुष्प्रापा गुरुरमस्वात्‌ सद्ध्मपुद्धिन फदाचित्‌ सदयुद्धों जाता यामपि पुनरपि शुमगुरु) दुरूम!-दुष्प्राप! चेदु-पदि स गुरु। पृण्येन प्राप्त), सपापि-एव सामप्रीपोगेईपि अम्री भाद्वाः स्वृद्दिस क्चु नाठ-न समर्याः। कपम्मूता सना। गण्छस्पितिश्पाइता!-गच्छस्पित्या-गष्छमर्यादया ब्याइता/-बश्ती कृता। | एव स्पिते क पुरुष प्रूम), के पुरुपम्‌ इइ-शगति माथयमद्टि-प्ररस प्रपप्मि, फ़ पुरुपम्‌ माराष्यमहि- जाराष्पामः हि हमे ॥ १४ ।॥ पझुरप्षामः किछ को5पि रह्रशिद्युक। प्रम्ग्प पेस्ये छणित्‌ , हृरबा कृष्मम पश्ठमछ्तितकतिः प्रापक्तराबायेरम्‌ 1 चित्रें सेयगृ्ट ृद्दी घति निखे गचछे झुद्धम्पीयति रद झड्टीयठि बातिशीयति घुपाम्‌ विश्व बराशैयति ॥ १७ ॥। घ्यासपा--प्लुर्भाम० ॥ हिलति संमाबनायों को5पि धुम्धामा।-प्षुपपा पामा-धीषः झुस्घामः एफम्मूवो रहप्षिश्चद्ठ -रहुस्पपाठः सर बेशग्पा माबठपि कृषित्‌




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