जैनमत - प्रभाकर - किताब | Jainmat-prabhakar-kitab

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Jainmat-prabhakar-kitab by श्री आत्माराम जी - Sri Aatmaram Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बीच बयान दीक्षालत्र और नजुम- ११ निकल लल डी जी सन्‍न्‍ससस ली लललस सर स+ इब्ररतकों बहुत लोग पसंद करेंगे, चुध आर शनिऊे सितारे केद्रमे होनेसे ओर मगल बृहस्पति त्रिफोणमे होनेकी वजहसे हमेशा अपने साधुपनेमे सुण रहेगें, चारहमे सानेमे शुक्रका सितारा अपने घ्रका मालिक होकर वेठाहे. इसलिये धर्मके कामोमे ओर मजहयी बहेसमें हमेशा फतेह पाते रहंगे, और इनके आगे एक निश्ञान वेतोर ध्वजा पताकाऊ़े चलेगा, जिस शस्प्शके लम्नका मालिफ और भाग्यका मालिक ठग्के मालिकों पुरी तौरसे देस- ताहों उसको दीक्षा जरुर हासिलहो, महाराजऊे दीक्षा लम्ममे भाग्य अुयनका सालिक शनि और लमग्नका मालिक बुध दोनो एकमाथ राज्यभुयनभ वेटेहे, इसलिये दीक्षायोग हुवा, और हमेशां इनका दिल धर्मपर पायद रहेगा, मगर मगलका सितारा नवमे खानेमे पडनेस इनको अपने शुरु भाइयोंसें नाइत्तफाकी वनी रहेगी, जिस शस्शे उम्ममे नयमे सामेक्ा मालिक दशमे सानेमे पडा हो आए दशमे सानेका मालिक नवमे सानेमे पडा हो उसऊों हमेशा राज्ययोग पना रहे, महागजके दीक्षाठुममें देसठी ! नवमें धुव- नऊा मालिक गनि दशमे पडा है, ओर दशमे ध्रुवनका मालिक बृहस्पति नवमे पडा है, जिसकी बदोलत महाराज अपने सापुपनेमे बतोर राजऋषिरे बने रहेगें, और पड़े बड़े सित्ताव पायगें, तीसरे भ्रुवनमें चद्रमा मित्रक्षेत्री होकर पडा है, और घर्म- आपनऊफो पुरी तोरसें देसताहं, इसलिये दिनपर दिन इनके परा- ऋ्रमकी तेजी रहेगी, आर धर्मझों तरकी ठेते रहेगे, दुसरे शुबनमें केतु पडा है, इसलिये हमेशां सफर करते रहेगे एफ जगह कयाम न करेगें, छठे शुवनका मालिक मगर नवमे धुवनमे बेठा हे, इस- लिये बीमारी और दुष्मनोसें मेहकुज यानी बचे रहेगें, मिथुन- सुपमे दीक्षा लेनेयाला शख्णश आलादजेका साथु महात्मा होताहे, महाराजका दीक्षालम मिथुन सिरसोदयी होनेसे जो काम अपने दिलमे फरना चाहेगें उसको पुरा करे छोडेगें, रपाह मुश्किल हो




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