पातञ्जलयोगदर्शनम् | Patanjal Yogdarshanam
श्रेणी : दार्शनिक / Philosophical, योग / Yoga

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
26 MB
कुल पष्ठ :
522
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( १५ )
ग्रन्थ की भाषा की माँति माघा-और न्यायादि अन्य दशनों के मतों का अनुल्लेख,
उसकी प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं । यह व्यास जी द्वारा रचित है। अवश्य ही ये
व्यास जी महाभारतकार कृष्णद्वैपायन व्यास नहीं हैं । बुद्ध के कुछ काल के बाद जो
व्यास जी ये उन्हीं के द्वारा यह माष्य रचा गया । अतिदीध॑जीवी एक व्यास की कल्पना
करने की अपेक्षा अनेक व्यासों को स्वीकार करना अधिक थुक्तिसंगत है | प्रत्येक कल्प
में व्यास को आविर्भाव होता' है, यद्द प्रवाद वास्तव में व्यास की अनेकता का द्रोतक
है। पुराण में यह भी मिल्ता है कि व्यास २८ हुए हैं ।११ न्याय के प्राचीन वात्स्या-
यन भाष्य में व्यासमाष्य उद्घृत हुआ** है। कनिष्क के समय के भवन्त धर्मत्रात
- २०. चुद्ध के काल के विषय सें मतमेद है । मेरी दृष्टि में हुद्ध का जन्म हैसा-
पूर्व ५८२ में और निर्वाण ५०२ में ( हैं० पू० ५०१, अग्निल १७ ) हुआ | इस मत
के सयुक्तिक एवं सविस्वार अतिपादन के लिए मुन्रि श्री नगराज जी कृत महावीर और
बुदू की समसासयिकता' लेख दृष्टच्य ( जैन भारती, वर्ष ११॥४-११।१० जक्लू )1
बुद्ध को हैं० पू० १८७३ में आविभूत मानने की जो -परम्परा डै, वह यदि वस्तुतः
सत्य प्रमाणित हो तो त्रिपिंटक का रचनाकाल भी भ्राचीनतर सिद्ध होगा । [प्रम्पादक]
, « २३, पुराणों में विभिन्न मन््वन्तरों में होने वाछे २८ ज्यासों के नाम मिलते हैं
( द्व० कूमंपु० ११५१1१-१०, विष्णुपु० ३।३, किड्गपु० १।७ जादि ) जिनसें कृष्ण
ट्वैपायन २८ वाँ है । [ सम्पादक ]
१२. वात्स्यायन भाष्य, ( १९६) का वाक्य है--“यथा सोअ्ण विकारों
व्यक्तेरपैतति निस्य॑स्वप्रतिपेधाद् , न निस्यो विकार उपपचते । जपेतो5पि विकारो$स्ति
विनाद्षप्रतिपे घाव ; सोअ्य॑ निरयस्वप्रतिपेधादिति हेतु ब्यंक्तेरेपेदो5पि विकारो5स्ति
इस्यनेन स्वसिद्धान्तेम विरुष्यते ॥? व्यासभाष्य का वाक्य हे--तदेतद ज्रेलोक्या
व्यक्तेरपेति, कस्मात् नित्यस्वप्रतिपेधात् । खपेतमप्यस्ति विनाद्प्रतिपेघात् (३।१३)।
यह आइचर्ण है कि न््यायवात्तिक, न््यायवात्तिकतात्पर्यटीका तथा परिशुद्धि टीका में
भाष्यवाक्य की ब्याख्या के प्रसंग सें यह नहीं कद्दा गया है कि साप्यसन्दर्भ का
'लट्दय_व्याससाध्य है, यद्यपि टीकाकार तथा परिशद्धिकार दोनों ही व्यासभाष्य
से परिचित थे । ऐसा प्रतीत होता है कि आचाय वार्पगण्य के संप्रदाय में यह' मत
प्रचक्षित था, क्योंकि युक्तिदी पिका में कहा गया है---“वया च चार्पग्रणाः पठन्ति-
ददेतत् न्रेकोक््य व्यक्तरेति, न सत्वात् । अपेतमप्यस्ति विनद्याअ्नतिपेघाव । संसर्गां
च्चास्य सोद्षम्यम् , सौक्ष्य्याच् च अनुपकब्धिः ( ३० कारिकारीका ) | स्यायभाप्य-
कार का रूढ्ष्ये कौत अन्य है, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता । पर उनके
लिए वार्यगण्य के भ्रन्भ की अपेक्षा व्यासभाप्य से ही इस सद को जानना अधिक
_ संभव ग्रतीत होता है। | सम्पादक ]
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