सूर्यप्रजानापती चंद्रप्रज्नापति | Suryapragapti Chandrapragyapti

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Suryapragapti Chandrapragyapti by उपाध्याय श्री मधुकर मुनि - Upadhyay Shri Madhukar Muni

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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“एयसि ण एमहालयसि लोगसि नत्थि केइ परमाणुपोग्यलमेत्ते थि पएसे जत्धथ णञ्मय जीके ण जाए वा नमएवा वि। ““विया स. १२, उ. ७, सु. ३/१-२ __भर्थात्‌ इस लोक का ऐसा कोई भ्रदेश नही है, जहाँ श्रनेक बार जीव उत्पन्न हुआ भौर मरा नही। जिस लोक में मानव उत्पन्न हुआ है, उसके स्वरूप-परिज्ञान से वह सोचने लगता है कि “इस लोक के प्रत्येक प्रदेश मे मेरे भ्रनन्तवार जन्म झौर मरण हुए हैं, भत इस पुन पुन जन्म-मरण के चक्र से मुझे मुक्त होना चाहिए ।” उसकी यह जागरूकता उसे विभिन्न पुण्य-पाय, सत्कर्म-दुष्कर्म आदि से परिचित कराती है भ्ौर वह उनके स्वरूपों से परिचित होकर असत्‌कर्मो से निवृत्ति एवं सतूकर्मप्रवृत्तिपू्वक अपने निरापद गन्‍्तव्य का निर्धारण करने में तत्पर हो जाता है। यदि समस्त लोक तथा पृथ्वी पर स्थित द्वीपादि का निरूपण शास्त्रों मे नही होता तो जीव अपने न्चस्प के परिचय से भ्रपरिचित ही रह जाता और वैसी स्थिति भे आ्रात्मज्ञान के प्रति श्रद्धान तथा ज्ञानादि को सम्भावनाएँ भी विलुप्त हो जाती । जो जीवे वि न याणाति अजीवे वि न याणति । जीवाओ्जीवे श्रयाणतों कह सो नाहीइ सजम ॥ ३५ ॥ जो जीवे वि वियाणाति अजीवे वि वियाणति । जीवाध्जीवे वियाणतों सो हु नाहीइ सजम ॥ ३६ ॥! जया जीवमजीबे घ दो वि एए वियाणई। त्या गई वहुबिह सब्वजीवाण जाणई ॥ ३७॥ तया गद्द। बहुविह सब्वजीवाण जाणईं । तया पुण्ण च पाव च वध मोक्ख च जाणई ॥ ३८ ॥ जया पुण्ण च पाव च बध मोक्‍्ख च जाणई। तया निब्चिदए भोए जे दिव्वे जे य माणुसे ॥ ३९ ॥ जया निव्विदए भोए जे दिव्वे जे य माणुसे । तया चयड सजोग स5$ब्मितरवाहिर ॥ ४० ॥। जया चयइ मजोंग सःब्भितर-वाहिर । तया मुद्दे मवित्ताण पव्वडइए श्रणगारिय ॥ ४१॥ जया मृदे भवित्ताण पव्वइए श्रणगारिय । तया नसवरमुक्किट्ठ धम्म फासे श्रणुत्तर ॥ ४२ ॥ जया सवरमुक्किट्ठ घम्म फासे अ्रणुत्तर । तया धुणदइ कम्मरय भ्रवोहिकलुस कड ॥ ४३ ॥ जया घुणइ कम्मरय श्रवोहिकलुस कंड । तया सब्बत्तयग नाण दसण चाभिग्रच्छई ॥ ४४ ॥ जया सब्वत्तग नाण देसण चाभिगच्छुई । तया लोगमलोग च॑ जिणो जाणइ केवली ॥ ४५ ॥। [२७ | 1




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