शिक्षण की वैज्ञानिकता | Shikshan Ki Vaigyanikata

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Shikshan Ki Vaigyanikata by रामनरेश सोनी - Ramnaresh Soni

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सुनाता। यह तो मुझे बाद मे पता चला कि प्रशिक्षणालयो म इसे “मोटिवेशन कहा जाता है। पर सच मान वह मेरी ज़रूरत थी अन्यथा मे कैसे पढा पाता ? तब तो आपके शेखर साहव एक नमूना ही थे गुरुजी! जणपतसिद्ठ ने फ़िर से बीच मे अपना वाक्य उछाला। नमूना क्या? मास्टरजी कहने लगे उनका तो मुझ पर भी एक दबाव था। अब्वल तो क्लास मे मेरा बहुत सा समय यूँही निकल जाता था और फिर छात्रो को उनके चले जाने के वाद भी उनके अदृष्ट चग्ुल से मुक्त कर पाना मेरे लिए टेढी खीर थी। एक दिन मिस्टर शेखर खाली घटे मे बाहर धूप म॒ बैठे किसी अग्रेजी पत्रिका पर उड़ती नज़र डाल रहे थे। मै भी उनके पास आकर बैठ णया। एकदम अग्रेजी लिवास सासकिन का सूट और काली वो1 दो एक मिनट बीते होगे मेने कहा शेखरजी ! आप तो क्लास म॑ लगे ही रहते है। लड़को को भी बहुत व्यस्त रखते है। कक्षा शिक्षण म आप सबसे अधिक किस बात पर बल देना पसद करते हे? वे ठहरे पूरे अग्रेज। अग्रेजी से कम मे क्‍या बोले ! जवाब मानो उनके पास पहले से तैयार था-रठारटाया बोले “आई वाट टु हेल्प स्टूडेठस रियलाइज देयर फुल पोर्टशियल एज इडिविजुअल्स टु बिकम सेल्फ एक्युअलाइजिय। मैं समझा नहीं सो पूछ वैठा वह कैसे सर? थोड़ा रुककर वे बोले “सरंटेनली इटस वेरी डिफिकल्ट टास्क बट एज ए टीचर आव इग्लिथ आई शेल स्ट्राइव फोर दिस गोल। बात तव भी मेरी समझ मे नही आई थी और आज भी मेरी समभझ से परे है। वह तो घीरे धीरे किश्तो मे सचाई सामने आई कि अपना प्रभा मडल बताने के लिए वैसी अमूर्त बाते कहना उनकी अनिवार्यता थी। वहाँ शिक्षण प्रक्रिया नहीं, एक वाग्जाल था एक दहशत थी. जिसके पीछे का मकसद बहुत छोटा था। छोटा क्या आछा कहिए भास्टरजी ! इस बार जियालाल बोला ऐसे नाटक किए दिना ट्यूशने थोड़े ही मिलती है? खैर मास्टरजी ने लगभग स्वीकारोक्ति-म॑ कहा अमूर्त शब्दावली मे अपनी श्रेष्ठता शालीनता भद्गरता का दिखावा करने घाले अध्यापक आज भी है. बल्कि अपने शिक्षक जीवन के चार दशकों मे मैने यही अमूर्त्तता बराबर व्याप्त देखी है। यह भी उतनी डी नुकसानदायी है जितनी किसी अध्यापक की तटस्थता। शिवरण की वैज्ञानिकता/3




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