मैं कुछ होना चाहता हूँ | Main Kuchh Hona Chahata Hun

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आहार पर अनुशासन १९ है। वह अपनी शक्तियो को पहचान सकता है, यदि उसमें साधना का भाव जागे। साधना का अथे है-अपनी शक्तियो को पहचानने का प्रयत्त । अपने भीतर अनन्त ज्ञान है, अनन्त आनद है, अनत शक्ति है। जब वह उनको पहचानने के लिए पहला कदम उठाता है, तब वह अपने आपको पहचानने मे सम होता है। ध्यान की साधना अपने आपको पहचानने का महान्‌ अनुष्ठान है। इस अनुष्ठान की सफलता तभी है जब आदमी अपने आपको बदल दे, रूपातरित कर दे । रूपान्तरण के लिए आहार-शुद्धि का अभ्यास आवश्यक है । हित आहार, मित आहार और सात्विक आहार के अभ्यास से रूपान्तरण घटित होने लगता है। जैसे-जैसे यह अभ्यास बढता है, शरीर की विद्युत्‌ बदलती है, रसायन बदलते है, चेतन्य-केन्द्रो की सक्रियता बढती है। जो केन्द्र सोने योग्य होते हैं, वे सो जाते हैं और जो जागने योग्य हैं, वे जाग जाते है। नीचे के केन्द्र सो जाते है और ऊपर के केन्द्र जाग जाते है। जिस दिन यह जागृति होती है, उस दिन नई दुनिया का अनुभव होता है, नये जीवन की अनुभूति होती है और तब आदमी इस स्वर में कह सकता है--जो सम्पदा आज तक -नही मिली, वह आज हस्तगत हो गई | जो जागृत्ति आज तक नही आई, वह आज घटित हो गई। जिज्ञासा समाधान प्रश्न :--आहार के द्वारा रसायन बदलते है और रसायनो से प्रवृत्तिया बदलती हैं । आज कत्रिम रसायनो के द्वारा प्रवृत्तियो के बदलने के प्रयोग चल रहे हैं। फिर उनमे भौर ध्यान मे अन्तर क्या रहा ? उत्तर--रसायनो का निर्माण केवल आहार के द्वारा ही नही होता, भावना के द्वारा भी महत्त्वपूर्ण ठग से होता है। हम भावनाओं के द्वारा भी महत्त्वपूर्ण रसायनों को निर्मित कर सकते है, रसायनो को बदल सकते है । रसायनो को बदलने की सबसे उचित प्रक्रिया है ध्यान। आहार ध्यान में सहायक बनता है। उचित आहार के द्वारा उचित रसायनो का निर्माण होता है। उससे ध्यान मे सहयोग मिलता है, प्रवृत्तियो की निर्मिति में और उनके रूपातरण में सहयोग मिलता है । कृत्रिम रसायन निरापद नही होते । उनके साथ खतरे भी जुडे हुए हैं । इस तथ्य को स्वय वैज्ञानिक भी स्वीकार करते है । गोवर की खाद स्वाभाविक होती है । उससे बहुत अच्छा अनाज पैदा होता है । कृत्रिम खादों से अनाज के साथ-साथ विप भी पैदा होता है । कृत्रिम खाद की तरह ही है कृत्रिम रसायन । वे खतरे से खाली नही हैं। कृत्रिम रसायनों क अधिक प्रयोग चूहो पर, वन्दरो पर हो रहा है । अभी मनुष्यो पर विशेष अयोग नही हो रहे है । खतरे बहुत लगते है ।




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