आत्मस्वरूपविज्ञानोंपनिपत् प्रथम खण्डः | Atmaswaroop Vigyanopnishat Namak Khand-i

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Atmaswaroop Vigyanopnishat Namak Khand-i by मोतीलाल शर्मा भारद्वाज - Motilal Sharma Bhardwaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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तो: महाप्राण मरुमंएडलबेअवण भेप्ठिग्ररर # स्व० थ्रीगो विन्दरामजी सेकस्नरिया फी विमिल स्मृति के सम्बन्ध में- “ अस्तुत प्रकाशन में दो शब्द निवेदन कर देना भारतीय आर्पसनातन आस्नाय के द्वारा झलु- प्राणित 'इतक्षता-समपेण! दृष्ण्या न केवल प्रासब्विक ही, अपितु आनृशंसधम्मैधिया अ्रनिव्रायय कर्तव्य भी माना जायगा। अलुमानतः वि० सं १६८६ से भारम्भ कर वि० सं० १६६६ पस्वैन्त ( सब १६२६ से सम्‌ १६४२ पर्य्यन्त ) निगमपुरुष ( वेदशास्त्र ) की उफसना को सफलां एयं सुफल्ां बनाने फी फामना से भावितान्त:सरण इस व्यक्ति ले प्रन्यप्रएयन-अर्यप्रफाशन-प्रचारयायामाध्यम से यत्रतत्र प्रचा- आदि जिन थाह्य साधनों को प्रतीकविधा से माध्यम बनाया गया, उन साधनों को अमुक सीमापंस्थेन्त धन्वथे प्रमाणित करने वाले मान्य सहयोगियों के परिगशम में मद्गारा्ट्रआन्त बड़ प्रास्त एवं गुज्ज॑रप्रान्व के ततृप्रान्तीय साहित्यातुरागी ही प्रधान स्तम्भ प्रमाणित होते रदे । त्रगोदश (१३) पर्पात्मिफा उस अयधि में धुणाज्रन्यायेन यदि द्विः-त्रि:-मर्पान्तोय मान्य-सदमोगी उपलब्ध हुए भी, तो इस श्रेव भी विशेषतः गुश्जेरप्रान्तीय प्रधान स्तम्भों की मे रणा का ही सुपरिणाम था। अतणव इस दिशा में हम धपने अमिजन-देश की सम्पक्त विभृतियों के माम्मिक स्वहृप से प्रायः अपरिचित दी बने रहे । हाँ, सम्भवतः सब्‌ ३६ में घटिव-विघदित बल्यात्रा में मा० स्बशी पेणीशड्ूरजी शम्मों के आलोमश्य: ५/नखाप्रेभ्यः भ्म-परिश्रम, किया दपोयोग से बीकानेरराग्यगौरव भ्रेप्ठिपवर माननीय स्व० श्रीगन्सीधरणी जालान मद्दोदय से अवश्य ही हमारा निकट्तम सम्पर्क स्थापित हुआ था, जिनके महतोमद्वीयाम्‌ व्यक्तिस्व की महृती स्मृति से हम सदा धात्मबविभोर बने रहेंगे। झापद्दी के सहयोग से वकस य के प्रकाशनों मेँ सहस्षप्रपठात्मक दो गीताखण्ड कन्नकत्ता में हीं प्रकाशित हुए थे । पथ उस धर्गोय मद्गानात्मा की ऐसी साक्तिझ कामना थी कि, दमें अपने भ्रभिजनकेन्ध (जयपुर) निवास का भोह ७ हमारी ऐसी फामना थी फि, पाश्चमीतिक शरीर से सर्वेथा छुशा, किस्तु मद्गाप्राण र््० सेक* ग्ग्र्शिजी का, तथा उनके सुपूत्र निगमागमनिष्ठापरायथ सौम्यमूर्ति सर्वश्री माननीय श्रेप्तिप्रबर श्रीकुदीलालजी सेकसरिया का चित्र भी प्रस्तुत प्रकाशन में प्रकाशित क्रिया जावा। किन्तु आप्रह करने पर भी मा० श्रीकुड़ीलालजो ने इस लोकैपणात्मक दृष्टिफोण फा समर्थन न किया। अतपब्र विवशतावश हम अपनी इस प्रासब्षिक कामना को इस प्रकाशन में मूत्तेहूप न दे सहेे। अवश्य ही किसी श्रम प्रकाशन में इन दोनों मद्दालुभायों के पूर्ण परिचय के साथ चिप्रप्रकाशन के सम्बन्ध में भी हमें झपनी सद्दज स्वतन्त्र मनोवृत्ति का अनुगामी वन द्वी जाना पढ़ैया ।




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