कल्याण [पंचम खंड] [फरवरी १९४५ अंक ] | Kalyan [Volume 5] [February 1945 Ank]

Kalyan [Volume 5] [February 1945 Ank] by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पातालखण्ड 1] क# युद्धमै उचके द्वारा सेनाका संद्ार और काठजित्‌का चघ + | श 1 | १5 खंडगधारी हाथकों कटा देख सेनापतिने क्रोध भरकर चार्ये हाथसे छवपर गदा मारनेकी तेयारी की । इतनेहीमें लवने क्लिक अर हु छा शक सपने तीखे वाणोंसि उनकी उस बॉहकों भी भुजबंदसहित काट गिराया । तदनन्तर» कालायिके समान प्रज्वछित खड्ग हाथमें छेकर उन्होंने सेनापतिके सुकुटमण्डित मस्तकको भी घड़से अलग कर दिया । ही सेनाध्यक्षके मारे जानेपर सेनामें मदहान्‌ हाहाकार मचा । सारे सैनिक क्रोधमें भरकर लवका वध करनेके लिये क्षणभरमें आगे बढ़ आये; परन्तु लवने अपने बा्णोकी मारसे उन सबको पीछे खदेड़ दिया । कितने ही छिन्न-भिन्न होकर वहीं ढेर हो गये और कितने ही रणभूमि छोड़कर भाग गये । इस प्रकार सम्पूर्ण योद्धाओँकों पीछे हटाकर लव बड़ी प्रसन्ताके साथ ,सेनामें जा घुसे । किन्हींकी वेिं; किन्हींके पैर, 'किन्डींकि कान, किन्हींकी नाक तथा किन्हींके कवच और कुण्डढ कट गये । इस प्रकार सेनोपतिके मारे जानेपर सैनिकों - +«. का भयछकर संदार हुआ । युद्धमे आये हुए, प्रायः सभी वीर मारे गयें, कोई भी जीवित न बचा । इस प्रकार लवने शात्र- ससुदायकों परास्त्र करके युद्धमैं' विजय पायी तथा दूसरे योद्धाओंके आानेकी आशाड़ासे वे खड़े दोकर प्रतीक्षा करने हनन द कगे । कोई-कोई योद्धा भांग्यवया उस युद्धसे बच यये । उन्होंने ही. शात्रुघ्के पास जाकर रण-भूमिका सारा समाचार सुनाया. ।. बालकके हाथसे कालजितकी मृत्यु तथा उसके विचित्र रण-कौशालका छत्तान्त सुनकर दतरुन्नको बड़ा विस्मय हुआ । वे बोले--'बवीरों ! तुमलोग छल तो नहीं कर रहे दो १ तुम्हारा चित्त विकल तो नहीं है १? कालजित्‌का मरण कैसे हुआ ! वे तो श्रमराजके ल्ये भी दुर्घष थे ! उन्हें एक वालक कैसे परास्त कर सकता है !? झतरु्की बात सुनकर खूनसे लथपथ हुए उन योद्धाओंने कहां--'राजन्‌ ! इम छल या खेल नहीं कर रहे हैं; आप विश्वास कीजिये । कालजित्‌की सृत्यु सत्य है और वह लूवके ददाथसे दी हुई है । उसका युद्धकौदाल अनुपम है । उस बालकने सारी सेनाको मथ डाला । इसके बाद अब जो कुछ करना हो; खूब सोच-विचारकर करें | जिन्हें युद्धके लिये भेजना हो) वे सभी श्रेष्ठ पुरुष होने चाहिये ।” उन वीरोंका कथन सुनकर शत्रुन्नने श्रेष्ठ बुद्धिवाले मन्त्री सुमतिसे युद्धके विषयमें पूछा--'मन्तिवर ! कया तुम जानते दो कि किस वालकने मेरे अश्वका अपदरण किया है १ उसने मेरी सारी सेनाका) जो समुद्रके समान विशाल थी; विनाश कर डाला हैं ।? खुमतिने कहा--स्वामिन्‌ ! यदद सुनिश्नेष्ठ वाव्मीकिका महान्‌ आश्रम है; क्षत्रियोंका यहाँ निवास नहीं है । सम्भव है इन्द्र हों और अमर्षमें आकर उन्होंने घोड़ेका अपहरण किया हो । अथवा भगवान्‌ शक्कर ही वाठक-वेषमें आये हो अन्यथा दूसरा कौन ऐसा है; जो तुम्हारे अदवका अपहरण कर सके । मेरा तो ऐसा विचार है कि अब तुम्हीं वीर योद्धाओं तथा सम्पूर्ण राजाओसे घिरे हुए वहाँ जाओ और विशाल सेना भी अपने साथ ले लो | तुम दायुका उच्छेद करनेवाले दो; अतः वहाँ जाकर उस वीरकों जीते-जी बाँघ लो । मैं उसे ले जाकर कौठुक देखनेकी इच्छा रखनेवाले श्रीरघुनाथजीकों दिखाऊँगा । मन्त्रीका यह वचन सुनकर द्यत्रु्नने सम्पूर्ण वीरॉकों आज्ञा दी--'ठमलोग भारी सेनाके साथ चलो; में भी पीछेसे आता हूँ ।” आशा पाकर सैनिकॉने कूच किया । वीरोंसे मरी हुई उस विशाल सेनाको आते देख लव सिंहके समान उठकर खड़े हो गये । उन्दोंने समस्त योद्धाओको सर्गोके समान ठुच्छ समझा । वे सैनिक उन्हें चारों ओरखे घेरकर खड़े दो गये ।




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