संत संग्रह | Sant Sangrah Volume-ii

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Sant Sangrah Volume-ii by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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' संत संग्रह भाग दूसरा । ३६ त प्र.शव्द शादिसवों ॥ के ः नाम रस पीवो:गरु की दातः। शब्द संग भींजो मन कर हाथ ॥ १९॥ चरन गुरु पकड़ो तन मन साथ । मान मद मारो आवे शांत ॥ ९॥ परख कर समभ्हो गुरु की बात। निरख कर चलियो माया घात ॥ ३॥ जक्त सब डूबा भीजल जात । नाम बिन छुदे न जम का नात,॥ ४ ॥ चाट घट उलठो दिन और रात । मोह की बाजी होगी मात ॥ ४ ॥ सुरत से करो शब्द बिख्यात । गगन चढ़ देखो जा साक्षात ॥ ९॥ सिटे फिर मन की सब उत्पात । राधास्वामी परखी और परखात ।/०॥ ॥ शब्द तेरेसंवाँ ॥ सुरत क्यों भूल रही । अब चेत चलो स्वामी पास ॥ ९॥ हे मनुवाँ तुम सदा के संगी । त्यागो जगत की आस ॥ २॥ हे इंद्रियन तुम भोग दिंवानी | क्यों फँसो काल की फाँस॥ ३॥ जरुदी से अब मुख को,;मोड़ो । अन्तर अजब बिलास ॥ ४ ॥ जैसे बने तैसे करो कमाई । घर चरनन बिस्वास ॥ ५४ ॥ राधास्त्रामी दीनद्याला । दे हैं अगम ' निवास ॥ ६ ॥ तब सुख साथ रही घर धपने । फिर होय न तन में बास॥ ० ॥ ॥ शब्द चौथी सब ॥ सखी री क्यों देर लगाई, चटक चढ़ो नभ द्वार ॥ ९१ स नगरी में तिमिर समाना, भूल भरम हर बार ॥ २॥ 'खोज करो उअन्तर उजिंयारी, छोड़ चलो नौ द्वार ॥ ३॥ सहस कँवल 'चढ़ त्रिकुठी घाओ, भवर गुफा सतलोक निहारं ॥४॥ अउख अगम के पार सिंधारो, राधास्त्रामी चरन सम्हर ॥ ४॥ प शब्द पशोसवाँ ॥ ... *., क्या सोबे जग में नींद भरी । उठ जागो जल्दी. भोर भद्दे 0.३ ॥ पंथी सब उठ के राह । तू मंजिल अपनी 'बिसर साई ॥ ९त




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