ज्ञाताधर्मकथाङ्ग् सूत्रम् तृतीयः | Gyata Dharm Katha Sootram -3

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Gyata Dharm Katha Sootram -3 by घासीलाल जी महाराज - Ghasilal Ji Maharaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भनगारघर्मास्तदर्षिणी शी० अ० १४ तेदलिपुत्रप्रधानचरितवर्णनम्‌्‌ १६ गत्वा तानग्रे कृत्वा स्प्रयम्त अणुगच्छद अनुगच्छति, तेपां पृष्ठवर्तीयूत्वा गच्छति, अनुगम्य, आसनेन उपनिमन्त्रयतिःःआसनदानेन तान्‌ पुरुषातुपवेशयति, उपनि- मन्ज्य, आस्रस्थः, विस्वध्यः एतेपाममात्यपुरषाणां सत्कारों यथावज्जात इति हेतो! स्वस्थमना। थूत्वा सुखासनवस्शव+्ूझ्वयमपि स्वकीबासने खुखोपबिष्ठः सन्‌ एवमददत्‌-संदिशन्तु खल हे देवानुप्रिया।! सब॒तांक्रिमागमनप्रयोजनम्‌ ? ततः खल ते आम्यन्तरस्थानीयाः पुरुषाः कहादं मृषीकारदारकम््‌ एयमबदन-बर्य खल देवामुभिय ! तब दुहितरं भद्राया आत्मजां पोट्डिलां दारिकां तेवलिपुत्रस्य भार्यात्वेन हणुमः, तह यदि खलु त॑ ' जाणपि ' जानासिज ्मन्यसे, हे देवालुग्रिय ! यद्‌ अस्माकमेतचत्कन्याविपयक याचने “ जुत्त वा ! युक्त वारउचितम पत्त वा प्रापं वा सनसिसेलग्न वा ' सछझाहणिज्ज वा ! छाघनीयं वानप्रशंसनीय वा अपि च 'सरिसो वा संनोगो' सदक्ञो वा संबोगः तेतलिपुशेण सह तव कन्याया वैवाहिकः कर फिर चह सात आठ डग प्रमाण आणे उन का सत्कार करने के लिये गया। चहां से उन्हें आगेकर के वह स्वर्थ उनके पीछे २ आधघा। आकर के फिर उसने उन्हें आखसनों पर बेठाया-बेठा कर आश्वस्त विश्वस्त होकर बाद में वह स्वयं दूसरे अपने आघन पर शान्ति पूर्वक बेठ गया। बेठ जाने के बाद फिर उसने इस प्रकार कहा- हे देवालुप्रि यो ) कहिये-किस कारण से आप यहां पघारे हैं-आपलोगों के आने का क्‍या प्रधोजन है-इस प्रकार उसके पूछने पर उन अभ्यन्तर स्थानीय पुरुषों ने उस खुबर्णकार के पुत्र कलाद से इस प्रकार कहा ( अस्हे णं देवाणुप्पिधा ! तब धूथे मद्दाए अक्षय पोहिल दारियं तेयलिपुत्तसस मारियताए वरेमो, ते जइणं जाणलि देवाणुप्पिया ! जुत्ते था पत्ते वा सलाहणिज् वा सरिसो वा संजोगो ता दिल्ल उणं पोट्टिला दारिया तेवलि- 8ोले। थर्ध ने तेमना स्वागत भारे स्राव स्थाई पणक्षां साभे जये।, त्यांथी तेशु नावनाशणाने जाणण 3रीने अटके 3 पाते तेजिानी पाछण 'पाछण याधक्षता त्यां जानये। लने जावीने तेएशु तेमेने जासना 5प२ 'णिसाइया, त्यारपछी जाधिस्त जिश्वस्त थर्ध ने ते पाते जीव्न णासन 8पर शॉतिपूर्प६ जेसी जये।, णेशीने तेणु तेजाण विनय पूत्र॑ं5 इच्ु 3 ले इेवाबुजिये। ! जाले।, तभे शा आरणुथी थीं जानया छे। १ तने शा अवेन८नथी खाव्या छे। ? समा रीते इलाह ( सु१- जुधआर ) नी बात सांसणीने ते जाष्यतर स्थानीय धुइ्षे जे तेने मा भभाणे इल्लुं 8 ( अम्हेण देवाणुप्पिया ! तब धू्य भद्दाए अत्तयं पोड़िल दारिये तेयलि पुत्तस्स भारियत्ताए बरेमो, ते जहणे जाणसि देवाणुप्पिय ! जुच् वा पत वा सलाइणिज्ज है




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