यज्ञवल्क्य स्मृति | Yagyawalakya - Smriti

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Yagyawalakya - Smriti by गिरजा प्रसाद द्विवेदी - Girja Prasad Dwivedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जज आए 1 बह्मशानी और योगी थे। उनका स्थान ऋषियों में बहुत ऊँचा साना यया है। इसलिए उनकी स्सृति भी सर्वमान्य है। इस सस्ते के सिवा, आप वाजसनेयिसंहिता और शतपथ न्राह्मयण के भी आवेभोवकतो हैं। छक यो गशासत्र को भी आंपने बचाया हैं । ृहदारणयक-उपनिबद को आपने . सर्यभगवान से शात किया था। यह वात स्वयं इस स्छति में लिखी हैः-- .. ह्ञय चारण्यकमह यद्ादत्यादवासदानय | हाणशाशशल्र च्‌ सत्पोक्त डाड याूउमसमभाप्सतदा ( पायश्िचाध्याय, इ्लो० १०1) पाशनिसन्नों के वरर्तिककार संग्रसिद्ध कात्यायन ने अपने सवानुक्रमणणीनासक अन्य में-- : शक़ानि यज़ंषि मगवान्‌ याज्ञवल्क्यो यतः आ्राप र॑ विवस्वन्तम । ' ओर शूतपथबाहयण के शेषभाग सें लिखा हे- . . . आदित्यांनीमानि शुक़ानि यज़ूंषि सूच साझवस्ब्सथनाख्यायन्त | है इन सब लेखों से याज्ञवल्क््य. के प्रकट किये हुए वेज. “भाग का पता पूरा मिलता है। - ० 9.2 सशिवल्क्‍य का ससय। - . पाशिने ने अपने सूत्रों में बाजसनेयीं, शतपथ ओर यांज्ञ चल्क्‍थ' इन नामों के विषय सें- कछ नहीं लिखा। ' पुराणप्रो, क्ेयु आह्यणकल्पंषु! इस सन्न का वार्तिक कोस्यायन ने अकार लिखा है-- 3राशआक्तपु ब्राह्मणकल्पेषु याज्ञवल्क्यादिभ्य प्र तिषेधस्तुल्यकालत्वात्‌ । क्‍ अगर पतज्ञाति ने महाभाष्य में लिखा है-- .




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