याज्ञवाल्क्यस्मृति | Yagvalkaysmriti

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Yagvalkaysmriti by गिरजा प्रसाद द्विवेदी - Girja Prasad Dwivedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(२) इत्यादि विषयों का मनु आदि स्पृतियों में विस्तार से प्रतिपादन किया गया है।याजवस्कयस्मृति के आदि में मन्वाज्रिविप्णुहारीत- इत्यादि कई स्मृतियों के नाम ई । इससे निश्चित होता हें कि इन सब स्मृतियों को देखकर। सबका सारभूद याज्षवस्क्यजी ने अपनी स्मृति बनाई है। मल के वाद याज्वस्क्यजी का हो नाम - लिया जाता है। वे बड़े महि, ब्रह्मज्ञानी ओर योगी थे। उनका स्थान ऋषियों में बहुत ऊँचा माना गया है । इसलियें उनकी स्मृति भी सबमान्य है। इस स्मृति के सिवा) आप वाजसनेयिसंहिता ओर शतपथ- ब्राह्मण के भी आविभावकर्ता हैं। एक योगशास्र को भी आपने बनाया है । बृहदारएयक-उपनिषद्‌ को आपने सूर्य मगवान से 4७ प्राप्त किया था । यह बात स्वयं इस स्मृति में लिखी है+-- क्षेयं चारएयकरमह यदादित्यादवाप्रवान। योगशात्र॑ च मत्योक जय योगमभीप्सता ॥' ( प्रायश्चित्ताध्याय, श्लीो० १० ) पाणिनिसूत्रों के वातिककार सुप्रात्तिद्ध कात्यायन ने अपने सवोनुक्रमणी नामक ग्रन्थ में-- _शुक्कवानि यजूषि भगवान्‌ याज्ञवस्क्यों यतः प्राप त॑ 'विवस्वन्तम्‌ | ु ओर शतपथब्राह्मण के शेष भाग में लिखा है-- आदित्यानीमाने शुक्कानि यंजूंषि वाजसनेयेन याज्ञवल्कयनाख्यायन्त ।' रा इन सव लेखों से याज्ववस्प्ग्न के प्रकृद किये हुए,वैदिक भाग क्रा.पंता पूरा मिलता है। , 9»: ध्ा हि 4 1




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