शिक्षा में नवाचार एवं आधुनिक प्रवृतियाँ | Shiksha Men Navachar Evm Adhunik Pravartiyan

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Shiksha Men Navachar Evm Adhunik Pravartiyan by शंकर शरण श्रीवास्तव - Shankar Sharan Shrivastav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शैक्षिक नवाचार 15 करने के लिए परिवतन के इच्छुक मेतानो या प्राचायों को सबसे पहले उन लोगो को घुनना पडेगा जो समाज वी पराश्षितता के बध्व को तोडकर नवाचार को सबसे पहले अपनाते हैं । ऐसे लोगो को आदशश के रूप मे सामने रखकर उहे सम्मानित कर आय व्यक्तियों मे भी पराश्चितता के अवरोध को दूर किया जा सकता है। (५) नैतिक मन (5एएथ ८१०)--व्यक्ति की ऐसी प्रवृत्ति जो पुरातन भ्रद्धा बिदुओ, मायताओ एवं नैतिकता के कारण किसी नवीनता अथवा परिवत्तन से बचने के लिए उसे बाध्य करती है। परिवतन चाहने वालों को इस अवरोध को तोड़ने के लिए विश्वाप्तोत्पादक म्राकषक विधियों (9675739५6 70९100) का प्रयोग करना चाहिए । (श) भात्म विश्वासहीनता (501 0४175४1)--प्राय व्यक्तियों से स्वयं अपनी ही क्षमताओं पर विश्वास नहीं रहता । वे सोधते हैं कि उनमे इतनी ताकत कहाँ जो वे पुरातन परम्पराओं वा तोड सकें । इस बआत्म-विश्वासहीनता को नेतृत्व द्वारा धीरे धीरे मनोवेश्ञानिक उपायों से पुरस्कार एवं सम्मान देने की विधि द्वारा परिवतन की प्रक्रिया को पुननलित (शत्रणि००) कर दूर किया जा सकता है। (९7) भसुरक्षा एवं प्रतिगमन (15८८019 थ10 उ6.1०5॥801)--नयी चोज को अपनाने के कुछ समय बाद ही उसे छोडकर पुन पुरानी चीजो या ध्यवहारों की ओर वापस आ जाने की प्रवृत्ति को प्रतिगमन कहते हैं। नवाचारों को अपवाने के बाद थोडी-सी कठिनाई के आते ही व्यक्तियों मे असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो जाती है। धबराकर वे पुन अपनी पुरानी चाल ढाल पर सोट आते हैं। इस प्रवृत्ति का निराकरण नैतृत्व या प्राचायें को नवाचार अपनाने वालो को पूण सरक्षण प्रदान कर दूर किया जा सकता है| (शत) आत्म परितोषी भविष्यवाणों (8० ा।ल्शाप्रहठ 9०%1॥02००8)--- व्यक्ति की सफलता एवं विफलता के पूव अनुभव भविष्य के लिए उसकी आशाभा, आकाक्षाओ और व्यवहारा के प्रारूप को निर्धारित करते है। मनुष्य जितमी ही मात्रा मं सफलता के प्रति आशावान होता है, उतनो ही मात्रा में वह नये कदम उठाता है । असफलता को झाशका किसी मये काय को करने के लिए व्यक्ति का रोकती है। नवाचार को अपनाते ही यदि व्यक्ति को सुखद अनुभव प्रदान किये जायें और उसे सफलता की अनुभूति हो तो आशा की जा सकती है कि व्यक्ति आत्म-परितोष के लिए नवाचार को ओर दढ़ता से अपना लेगा। अग्रेजोी कद्दावत है--'सफलता के समान भाय कोई चीज सफल नही होतो' (1२०४ाणट्ट आ००८६०६ ॥08 5घ0०९४६ ) 2. क्ियात्मक प्रतिरोध (८५४०6 का हैटएणा) परिवतन एवं नवाचार को व्यक्ति कई बार अज्ञानता, भूल चूक, सामाजिक प्रतिक्रिया और अन्तर्वेयक्तिक सम्बंधो ने कारण परिवतन एवं नवाचार को अस्वीकृत कर देता है ।




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