अमिय हलाहल मदभरे | Amiy Halahal Madbhare

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Amiy Halahal Madbhare by गोपाल गोस्वामी - Gopal Goswami
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
2 MB
कुल पृष्ठ :
214
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जिस गुणातोत ब्रह्म को सगुण रूप में समस्त देवों का प्रमु कशध घाता है, जि का श्रत, सइसफणों बाला शोप पाग सो न पा सका उसी मन मोशन की राधा ने अ्रधों मीनित नयन से ही वश में कर लिया। १भगवान शकर (तीन नेम) ब्रह्मा (झ्राठ नेत ) विषतु या इद्ध ( सहसाक्ष ) और शेष नाग (दो हआर नेत ) ने भी जिदे भली प्रकाए पहों देखा, छठी मन मोहन को राधिका! ने श्राधि नयन से वश में कर लिया। २निम्त के तीन पैंड तीनों लोक में नहीं समाते हैं उसे तुम अपने नैनों की पुतली में रस रही हो, दे राधिके, ठुम धन्य हो ! ३तुमने तो गोवधेन पर्वत का न्ल पर धारण दिया दै पर मैने तमको आँख को कोर पर ही उठा रकखा है।|श्रव तुम्हीं बताओ, इम दानों में किसने श्रधिक महत्व का काये किया है ! ४दे स्पाम, तुरयो बताग्रा डि तुममें श्रौर इन गोपियों में कौन बड़ा है? तुमने तो नख पर वेपल गिरि उठा रखा है और इन शोषिकाश्रों ने गिर ( गिरराज पर्वत सद्दित तुम्हें ) अपनी थार से घारण कर रक्‍म्दा है । ५इन नयर्ना को दरान की भूख लगी ही रहदोी टैजा कमी नहीं पमिल्‍्ती । भत्ता, मिने मयनों के ने ज्ञाम है ने पट, 3 कैसे तृत्र होग ! ६




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