पार्वती | Parwati

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Parwati by रामानन्द तिवारी शास्त्री - Ramanand Tiwari Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शअ्चेता अर्पित की भू ने कुछुमों में अन्तर की निधि सारी , अम्घर ने अनन्त दोपों में शुचि आरती उतारी; अन्तरित्ष ने घन - कलशों का अधष्य अनन्त चढ़ाया, जीवत ने अनन्त रागों में मंगल - पघन्दल गाया। अमित रत्न - निधियाँ बखुधा के निम्चत गर्भ में पलती , ज्योति आरती अयुत व्योम में स्व्रगे - शिखा - सी जलती ; ध्वयनित दिशाये कर अन्तर के मन्द्र -घोष बन्दन से अमित अमृत के अध्ये चढ़ाते मेव अनम्त गगन से ! तारों से आकुल हंग नभ में स्वप्त - सृष्टि के पत्ते , प्राची के पलकों में छवि के स्वगे अनन्त मचलते ; ओस - बिन्दु बन व्योम - कुसुस - से उतरे भूपर तारे, एक उडपा की समिति - लेखा ने कितने ' लोक सखेंवारे । नयतों की करुणा अवबनी के उर में रस बन आई , अधरों की आभा सुषमा -सी अखिल दिशा में छाई; हुई कऋृताथे प्रकृति थी अदूभुत दिव्य नवीन सृजन से , उद्भिज के अंकुर में होती श्री रोमांचित तन से। किस वसन्त के प्रथम प्रात में पुष्प प्रथम योवबन के खिल उठते, रुचि अलंकार बन प्रकृति - सनोज्ञ मदन के ; हरी - भरी रंजित धरणी के पुलकित' हृर्पित तन में श्री का सुपसित रूप विकसता नव जाम्रत जीवन में। आभा के अमिजात अमृत - सा डर - सागर में पत्ता संसृति के कुसुमोंका रस हो पूर्ण फलों में फलता ; शक्ति - बिन्दु - से जिनमें पल्ते बीज अनन्त सृजन के , हुये प्रकृति के पूर्ण चक्र में पूर्ण धर्म जीवन के।




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