हिन्दी उपन्यास साहित्य का अध्ययन | Hindi Upanyas Sahity Ka Adhyayan

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Hindi Upanyas Sahity Ka Adhyayan by एम॰ एम॰ गणेशम - M. M. Ganesham

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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4२ उपस्पास के जिकास कौ स्परेला सामाबिक दावित्व (0०91 70म707आाध्र15) हृप्टिपत होता है बड़ किसी लेखक के किसी उपन्यास में मही मिलता । 'प्रमा! में प्रभचस्द डे जिन अप शीबारोपण हुआ ६, थे द्वी म्रविक पुप्ट एवं परिमाजित कप में उसके ध्रम्य उपस्यायों में इृष्टिपत होती हैं। पभ्६ बरदात--'सेबासइस' के पश्चात्‌ प्रकाधित यह छोटा-धा उपन्यास अस्तुत 'सेगासइम” के पूर्ण ही लिक्षा भया था! यह पपने पूर्वक्स में 'प्रतापचसः (१६ !) नाम पे हिन्द में पौर 'बलबए ईंसार' शाम से उद्गू में प्रकाध्ित हुपा था ! सिषासदन' डी तुशता में मह मत्वस्त प्रमौड़ रचगा धिड होती है तो इसका कारण यही है। इसमें मी प्रेमचर्द हमारे समाज की डुछ धमस्पाशों की--विश्नेषकर स्थ्री- जीवन से सम्बन्धित प्मस्याभों की--धर्चा करते हैं। 'प्रेमा' प्रौर 'बरदान' को देखते हुए हम छमफ़ सकते हैं कि प्रेमचस्य भौ प्रारम्म में प्रपने पूर्णबर्तियों को प्राकर्षक दीखतेबाली स्जी-समस्याप्रों से ही प्राकृष्ट हुए 1 पर उनका ह्टिकोण वितास्त भिन्न था | प्रीम ही वे उस विद्याल दृष्टिकोण के प्रनुदल चीषन के विस्टृत स्गरूप के भ्रध्ममन एज ण्याक्ष्या की प्रोर प्रवृत्त हुए । ५७ सेबस्‍संदत--ओमा में जिस प्रेसचत्श का भ्रस्पस्ट कप में भाभाय मिलता है उसौको प्रधिक स्पष्ट एवं तिलरे हुए रूप में उपस्थित किया 'पेबासइन' ने । इसी सपन्पाप्त ते प्रेमच/र को एक उपत्मासकाए के रूप में प्रतिप्टित कर दिमा | प्राय के आपदच्ड से भापमे पर 'सैबासदत' मैं भसे ही शुछ कमियां हृष्टिगठ होँ तो भी हमें यह भानता पड़ेगा कि घघ बह सिला गया तब उस समय 0क के प्रस्प लेखकों के मी | उपस्वार्सों से बह मिस्न था प्रौर उनसे बहुत भागे बढ़ा हुमा था। इस ई॒ष्टि से बह सपते समय का सर्बभेष्ठ उपम्यास था भ्रौर बाद में भी बहुत्त समय तक स्वयं प्रेमचम्द के प्रदिरिक्त और कोई सेखक उससे अ्राये मड्ढी गढ़ सका । सेबासदइन' में भी प्रेमचस्द भारत कौ प्रभिप्नप्त भारी के प्जिशावक बनकर सामले भाये | छत्दति बैदया प्रथा कौ म्यकर समस्या का विस्लेपस किया भौर हमारे इम्मी समाज की कशई श्ौस दिलागी । इर्देज देने के निमित्त दारोगा इृप्सचस्द् को श्रो स्वभावदया एक भट्ट पुरुष थे भूस जेकर चेल छागा पड़ा ! फिर मौ ध्चित बद्ेज का प्रबत्थ त होते से उन्हें प्पती शग भुबती सुम्दरी श्रीशगती शड़ढी सुमत को एक प्रपान के द्वाव सौपकर तृष्द होता पढड़ा। प्रजोम्ए पह्दि में सुमद को एक घोरे-से प्रपराण के घन्ेह के भ्राभार प्र घर से निकाल दिमा | भारतीय छमाथ में पति को देवता सममते पर भौ पठि दवा परित्यक्त होते- डाशी मारी को ढैसी घोर दुइंप्ा में पड़ना पड़ता ईप्लौर बौसौ-कैंसी यातयामों को सहता पड़ता है. इसे प्रेशक मे सुमत के जौषत में प्रकट डिया है । घुमत को पड समाय हारा तिरम्द्ृत होकर दासमप्छो का भामय लेगा पड़ा । पमस्या इतने में ही सौमित गहीँ रहती । उप्का प्रभाव ध्रधिक स्वापक है। सुपदाई की दहन दोने के कारस उस्चकी छोटी बहत का बिबाह भी एक गजा। इठ ररड निर्शोय मबरेश शालिकाएों के बोषद को तसकसुस्व बनाकर मौ छो घमांज धर्म




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