सारस्वतम् | Sarasvatam

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Sarasvatam by काशिराम पाठक - Kashiram Pathak

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(४) भूमिका | जान सक्ताहै जिसको कि, इसके अध्ययनसे अल्पकाल्डीमे शब्दार्थ वोधका आनन्द इस्तगव डुअदै ऐसे इस परम हितकारी व्याकरण ग्रन्य पर ययार्य तत्त्वामृतवर्धिणी टीका न होनेके हेतु वहपुरुष मनहीं मन मटकतिये बिनको कि, गृहस्य कर्मवशसे इस व्याकरण ग्रन्यंके अभ्यात्त करनेस अवकाश गृरुके निकट रहनेके लिये नहीं मिलाया इसकारण सर्वसाधारण यनेके उपकारार्थ मैने वंदे श्रमसे इसप्रकार मापानुवाद कियाह कि, प्रथम सूत्रके पद तथा मित्र २ विमक्तियोके विवरणाक वत्पश्रात्‌ शत्ति तदनन्तर आर्थ तादर््य सहित हिन्दी मापा पश्चाद प्रयोगोका रदा हरण और यत्र तत्र टिप्पणी द्वारा शका समाधान और विशेष व्याकरण विषय उचित रीतिसे पपन्यस्त हैं भनेभी यह टीका स्वयडुद्धिस नहीं किया किन्तु चंद्रकीर्ति और प्रसादका सर्वभाव लेकर रचाहे अत बहुत मुबोध ओर विशाल डोनेस स्वरकीय मुखसे प्रशसा करना व्यर्थ हे क्योकि, पाठक गण स्वय हष्टिस परविश्कर कोटिश' आशीर्वचन कहते हुए मुझकी क्ृतकृत्य करेंगे तिसमे भी सकल गुणगणालकृत वैर्णव धर्म धूरीण वैदयवशावतम औक्ृणदासा- त्मय खेमराजयीने विद्वल्ननेंके द्वारा शुद्ध कराय मुद्रित मी इसरीतिसे करायाहे कि, मुद्रण शोमा अतीवचमत्क्त है उपमसहारम सर्व व्याकरण रसन्न महानुभावोसे इतनीहीं स्विनय प्रार्थना है कि, मानापिक निसर्गलन्य दोय वशसे जहाँ कहीं घ्रूटिरहगरई हो उसकी करुणामावसे मुझ ग्रन्य माषानुवाठकको मृचित करदेवेँ जिससे कि, दूसरी बार शुद्रकरादियाजाय ॥ “सूत्रमप्तशर्वी यस्‍्मे दढो साक्षात्मरस्वती ॥ अनुभूतिस्वस्थपाय तस्मे आ्गुन्वे नम ” ॥ इस व्याकरण ग्रन्थम सावमी मूत्र हैं यह सूत्र सरस्वर्तीने अपने परम उपासक अनुभूतिस्वरूपाचार्ग्य के ल्यि कहेये इसीसे इसकी सारस्वदी प्रक्रिया करत अल्प वुद्धिननोके छितार्थ अनुमूतिस्वरूपाचार्ग्यने इसका निम्र व्याय्या मुखकर सरल कियादे इसकारण अनुमूतिस्वरूपाचार्ब्यद्ती इस ग्रन्यके प्रतिपादन कर्त्ता मानेजानेरई यह अनुमूति- स्वसू्पाचार््य सरस्वती देवीके परम मक्तथें सरस्वतीकी उपासनाके प्रमावसे इनको सर्वावेद्या अवगन्न हुईथी प्क समय विद्वानोकी गोट्टीमें इनके मुखसे पुमु शब्दके स्थानमें पुलु शब्द निकल गयाया उस समय भशुद्ध होनेके कारण विद्ानेंने इनका उपहास किया तब अपनी उपह्ासताकों न सहकर इन्हीं अनुमूतिस्वरूपाचार्य्पने उत्तरदिया कि, जिसको कि, आप अबनी अज्ञानतासे अशुद्ध मानते हो वह अश्ुद्ध नहीं किन्तु शुद्धही है तव समस्त समासद विद्वात कहते लगे कि, यदि शुद्ध वी साधन कारिये किस व्याकरणसे ऐसा डोवा है तब अनुमूतिस्वस्थ्पाचार्य्यने कहा कि, कल हम तुमको इसका उत्तर ठेगे उस समय ऐसा कहकर निनगृहको पधारि सरस्वती की रपासना करनेलगे तथ अर्टरात्रके विषे सरस्वती स्वय खूपसे प्रत्यक्ष होकर अपने परममक्त अनुमूतिस्वरूपाचार्प्यले कहने लगी कि, वर- मौंगिये इस समय वड़ अनुमुतिस्वरूपाचार्य्य अपूर्व व्याकरणको डेवीसे मौंगते हुए तब देवी सातसौ सृत्र देकर अन्त- हित हो गई उस समय उस सारस्वती प्रक्रियाकी पाय हर्षित हो इस ग्रन्यके द्वारा पुक्षु शब्दको साथि स्वोपह्ास कर्ता विद्वानाऊं। प्रमन्न करते हुए तदनन्वर थिष्येके हिठार्य सरस्वतीग्रोक्त सुत्रोकी सरलरीतिसे व्याख्याकर सारस्वतनाम 2स ग्रन्यका रखते हुए यह जनश्रतिद्वै ॥ पण्डित-काश्िरामशार्म्मा-पाठक,मु०ठाटोछी 0 भाषाटीकासहितसारस्वतस्थप्रकर णा5तुक्रमणिका । “>-+-+++“अआड०8:८००८.----+ प्रफरणानि एट्रानि ग्रकरणानि पृष्ठानि सच्न्राप्रफजरणस म २ इसान्तसीरनिंगम «..-« २४७ स्वरसान्धि न दर इसान्तनपुसकलिंसस. « *. (५७ प्रकत्तिमाय - दर युप्मठस्मत्पकरणम > ब् १६३ व्यज्षनमस्धि र्ध अवग्ययप्रक्रणम * न र्‌छट पिसर्गसन्धि- ड़ स्त्रीप्रत्ययप्रकरणख .. « १७८ स्व॒सान्वॉलिड्रस ४४८ | विमक्त्यर्थो - कारकम ) - १८९ र्चरानदखानिंगस ८१ समास्त्रकरणवल « २०५ स्वगान्तनपु सफलिंगल १०२ नद्वितमत्रिया * न २३७ अल्प पंत १०८ इत्यछक्रमणिकासम्राप्ता !




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