श्रीमदनुयोगद्वार सूत्रम | Shreemadnuyogdwar Sootram

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Shreemadnuyogdwar Sootram by श्री आत्माराम जी - Sri Aatmaram Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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# प्नुयोगद्वार सत्र # ( २१ ) यही ज्ञ शरीर भव्य भरीर से व्यतिरिक्त द्ब्णवश्पफ ह ( सेस नो भागमओं दृब्माबस्सय सेत दव्यावस्सय ) अयानस्वरम्‌ नोझागप द्रब्पावश्यक पूर्ण हो गया है और इसी का ही नाम द्ृब्यावश्यक है । भाषाये-लौफोत्तरिक द्रष्पावश्यफ उसका नाम है जो साधु गुणों से रहित कप काय में दया न फरने माला अश्व फो नाई शीघ्रगामी गजलबत्‌ निरफुश बख्तों को धारण करने बाला, अपितु भिसने शरीर फो श्वृगारिव फिया हुआ भव अरिहर्ती की आहा से रहित स्वच्छन्दता से विघरकर छो दोनों समय आवश्यक फे लिये सावधान होमाता है उसी का नाम प्ञ प्रीर भष्य परीरण्पतिरिक्त क्नौकोसरिझ नो आगम द्ज्यावश्यक दे क्योंकि पएठन रूप ही उसका ऋतैर्प है | इसीछिये उसका नाम नो झागम द्रष्ियावश्यक है | इस के अनन्तर मावावश्यक का स्यारूयान किया जाता है। ७ झथ भावाधश्यक्‌ विपय ७ मूल-सेकिंते भावावस्सय ? २ दुविह परणत्त तजहा आगमभोय नो आगमझोय सेकिते आगमशो भावावस्सय्य ? २ जाणए उवउत्ते सेते झागमओ भावावस्तय ॥ पदार्थ-( सेकिंत मायाबस्सय ) शिष्य ने प्रश्न किया कि ह भगबन ! भा- बरावइपफ फौनसा है ? तब गुरु फहने गे ( भाभावस्सय ) भाजाबश्यक ( दु- मिह पएणत तजहा ) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (आगम- ओय नो झआगपमोप ) आगम से भौर नोआगम से अर्यात्‌-क्रिया रूप । शिष्य से फिर भश्न किया कि दे मगनन्‌ ! ( सेकिंते आंगमसाभावावर्प्य २ ) आ गम से माबाबश्यक फौनसा है ? सब गुरुने टथर दिया कि ( जाशए उथठसे ) जो झावश्यक् के स्वरूप दय उपशोग पूर्वक जानता हैं, उसी का नाम आगम से भावावश्यफ है ( सेव आगमओमावावस्सय ) अयानन्‍्तर इसी का नाम झागम से मावाषक्ष्यफ़ है सो आगम से मायादश्यक का स्वरूप पूछे हुआ ! भाबाये '-मावावर प[क दो प्रकार से बेन किया गया है-एफ तो आगम से और दिवीप नो भागम से जा भाषदपक फे स्वरूप प्रो उपयोग पूर्वफ मानता है और आस्पा फे माव उम्तमें स्थित है पह श्रागम से भावावइ्यक है| १-- चैतबस्थादि उसके विशेषण पद है 7




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