रूस की चिट्ठी | Rus Ki Chitthi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२३ रूसफी चिट्ठी उस जमानेमे जो लोग देशडी राजनीतिके क्षेत्रम मसाडा जमाये हुए थे, उनमें से ऐसा कोई भी न था; जो प्रामवामियोंफो सी देशका आदमी समझता हो । मुझे! याद है, पवना-कानफरेल्सफ्रे समय मेने उस समयके एक बहुत बढ़े राष्ट-नेतासे कहा था कि हमारे देशऊी राष्ट्रीय उन्नतिको यदि हम सत्य या चास्तविक बनाता चाहते है, नो समसे पहले हमें इन नीचेफे छोगेंडो आदी बनाना होगा। उन्होंने उस बातको इतना तुच्छ समझकर छडा दिया कि में रपट समझ गया कि हमारे देश-नेताओंने 'देश” नामके तर्तको विदेशी पाठशालासे समम्का दे, अपने देशके मलुष्योकी वे हृदयमे अज्लुभूति नहीं करते। ऐसी मनोद्ृत्तेसि छाम सिर्फ इनना ही है कि “हमारा देश विदेशियोके हाथमें है?--इस चातपर हम पश्चात्ताप कर सफ़ते है, उत्तेजित हो सकते हू, कविता छिस सकते हैं, असयार चछा सफ़ते हैं, मगर काम तो तभीसे शुरू होता है, जब हम अपने देशवासियोंको अपना आदमी फहनेके साथ ही साथ उसका दायित्व भी तभीसे स्वीकार कर ढें। सबसे बहुत दिन बीत गये। उस पवना-फानफेल्समे भाम- संगठनके पिपयमे मेने जो कुछ कहा था, उसकी प्रतिध्वनि बहुत बार सुनो है--सिर्फ शब्द नहीं; माम-हित्ते लिए अर्थ भी सम्ह हुआ है--परन्तु देशके जिस ऊपरी मजिलमे शब्दोंकी आवृत्ति हुई है, चहीं वह जे भी घूम-फिरकर बिछुम हो गया है, समाजफे मिस गहरे सद॒कमे गाँव डूबे हुए हैं, वहाँ तक उसका कुछ अश भी नहीं पहचा।




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