अंग सुत्तानी | Anga Suttani Part-i

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Anga Suttani Part-i by मुनि नथमल - Muni Nathmal

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मुनि नथमल जी का जन्म राजस्थान के झुंझुनूं जिले के टमकोर ग्राम में 1920 में हुआ उन्होने 1930 में अपनी 10वर्ष की अल्प आयु में उस समय के तेरापंथ धर्मसंघ के अष्टमाचार्य कालुराम जी के कर कमलो से जैन भागवत दिक्षा ग्रहण की,उन्होने अणुव्रत,प्रेक्षाध्यान,जिवन विज्ञान आदि विषयों पर साहित्य का सर्जन किया।तेरापंथ घर्म संघ के नवमाचार्य आचार्य तुलसी के अंतरग सहयोगी के रुप में रहे एंव 1995 में उन्होने दशमाचार्य के रुप में सेवाएं दी,वे प्राकृत,संस्कृत आदि भाषाओं के पंडित के रुप में व उच्च कोटी के दार्शनिक के रुप में ख्याति अर्जित की।उनका स्वर्गवास 9 मई 2010 को राजस्थान के सरदारशहर कस्बे में हुआ।

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२७ किया गया है | तीसरे वलदेव-वासुदेव के पिता का नाम रुद्द है, किन्तु समवायाग की हस्तलिखित वृत्ति मे रह” के स्थान में 'सोम' है। वस्तुत सोम” के वाद रुद्ट! होना चाहिए' । समवाय ३० (सूत्र १, गाथा २६) मे सभी सभी आदर्शों मे 'सज्कायवाय' पाठ मिलता है । वृत्तिकार ने भी उसकी स्वाध्यायवाद ---इस रूप मे व्याख्या की है। अर्थ की दृष्टि से यह सगत नही है । दशाश्र्‌ तस्कन्ध (सूत्र २६) मे उक्त गार्था उपलब्ध है। उसमे 'सज्फाय- वाय' के स्थान पर 'सब्भाववाय” पाठ है। दक्ाश्र्‌ तस्कन्ध के वृत्तिकार ने इसका सस्कृत रूप 'सद्भाववाद' किया है | अर्थ-मीमासा करने पर यह पाठ सग्रत प्रतीत होता है ।* प्र।चीन लिपि में सयुक्त 'रकार' ओर सयुक्त 'भकार' एक जैसे लिखे जाते थे। इस प्रकार के लिपिहेतुक पाठ-परिवर्तन अनेक स्थानों मे प्राप्त होते हैं 1 प्रति परिचय (क) समवायांग मूलपाठ यह प्रति जैसलमेर भडार की ताडपत्रीय (फोटोप्रिंट) मदनचन्दजी गोठी, सरदारशहर द्वारा प्राप्त है । इसके पत्र ६४ तथा पृष्ठ १२८ हैं किन्तु २४ वा पत्र नही है। प्रत्येक पृष्ठ मे ४ या ५ पक्तिया हैं तथा प्रत्येक पक्ति मे ११० अक्षर हैं। लिपि स० १४०१ । (ख) समवायांग सूलपाठ (पचपाठी ) यह प्रति गधैया पुस्तकालय, सरदारशहर से प्राप्त है। वीच मे मूलपाठ एवं चारो ओर वृत्ति लिखी हुई है । इसके पत्र १०६ तथा पृष्ठ २१२ हैं। प्रत्येक पृष्ठ मे € पक्तिया तथा प्रत्येक पक्ति मे ३०,३२ अक्षर हैं । यह प्रति १० इच लम्बी तथा ४३ इच चौडी है। इसके अन्त मे सवत्‌ दिया हुआ नही है । किन्तु पत्रों की जीर्णता व लिपि के आधार पर यह पन्द्रहवी-सोलहवी शताब्दी के लगभग की है । प्रति के अन्त मे निम्न प्रशस्ति है-- ॥छ।॥ समवाउ चउत्यमग ॥छ।॥ मकतोपि ग्रथाग्र १६६७ ॥छा॥ (ग) समवायांग सूलपाठ (पंचपाठी) यह प्रति भधेया पुस्तकालय, सरदारशहूर से प्राप्त है । बीच मे मूलपाठ एव चारो तरफ वृत्ति लिखी हुई है । इसके पत्र 5१ तथा पृष्ठ १६२ हैं। प्रत्येक पष्ठ में ५ से १२ पक्तिया है। प्रत्येक पक्ति मे ३२ से ४७ तक अक्षर हैं। यह प्रति १० इच लम्बी तथा ४ इच चौडी है ।लिपि सवत्‌ १३४५ लिखा है, पर सवत्‌ की लिखावट से कुछ सदिग्ध सा लगता है। फिर भी प्राचीन है । अन्तिम प्रशस्ति मे लिखा है-- प्‌ देखें, समयाझ्ो, पदण्णयसमवाझो छू० २३० का पाद-टिप्पण । २ देखें, समवाधो, समवाय ३०, सू० १, गाथा २६ का दूसरा पाद-टिप्पण ।




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