अध्यात्मकमल मार्तएड | Adhyatm Kamal Martand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना २५१ लाटीसंहितामे भी ग्रन्थकार महोदय अपनेको “कवि” नामसे नामाड्रित् करते और “कवि” लिखते हैं । जेसा,कि ऊपर उद्धृत किये हुए पद्य न॑० ६, नें० ७७४, (यह पद्म लाटीसहिताफे चतुर्थसगमें न० २७०-मुद्रित २७६- पर दर्ज है ) और नीचे लिखे पद्मों परसे प्रकट है-- तत्र स्थितः किज्न करोति क॒वि' कवित्वम्‌ | सद्दधेतां मयि गुण जिनशासन च ॥१-८६(मु० ८७) ॥ प्रोक्त सुत्नानुसारेण यथाण॒त्रतपचक | शुणब्तत्नय वक्तुमुत्सहेद्घुना कबि: ॥६-११७ (मु० १०६) इसी तरह ओऔर भी कितने ही स्थानोंपर आपका 'कवि” नामसे डलल्लेख पाया जाता है, कहीं कहीं अ्रसली नामके साथ कवि-विशेषण भी जुड्ा हुआ मिलता है, यथा--“सानन्द्सास्ते कविराजमल्ल '(५६)। आर इन सब उल्लेखोंसे यह जाना जाता है कि लागीसहिताके कर्ताकी कविरूपसे बहुत प्रसिद्धि थी, 'कवि' उनका उपनाम अथचा पद्विशेष था और वे अकेले (एकमात्र) उसीफे उल्लेख-द्वार भी अ्रपना नामोल्लेख किया करते थे--जम्बूल्वामिचरित” और छुन्दोविद्या्से भी “कवि” नामसे उल्लेख है। इसीसे पचाध्यायीमें जो अ्रभी पूरी नहीं हो पाई थी, अकेले “कवि” नामसे ही आपका नामोल्लेख मिलता है। नामकी इस समानतासे भी दोनों ग्रन्थ एक कविकी दो कृतियों मालूम होते हैं | इसमें सन्देह नहीं कि कवि राजमल्ल एक घबहुत्त बड़े विद्यान्‌ और सत्कवि होगये हैं। कविके लिए; जो यह कहा गया है फि वह नये नये सन्दर्भ--नई नई मौलिक रचनाए---तय्यार करनेमें समर्थ होना चाहिये[? चह बात उनमें ज़रूर थी श्रोर ये दोनों ग्रन्थ उसके ज्वल्तन्त उदाहरण जान पड़ते हैं। इन ग्रन्थोंकी लेखन-प्रणाली और कथन-शैली अपने मं “कविनूतनसंदसे: ”




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