न्यायबिंदु | Nyaayabindu

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
शेयर जरूर करें
Nyaayabindu by चन्द्रशेखर शास्त्री - Chandrashekhar Shastri

एक विचार :

एक विचार :

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

चन्द्रशेखर शास्त्री - Chandrashekhar Shastri के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
१६ भूमिंका |( उदाहरणके लिये शरीर ) और शसंघात ( <दाहरणके लिये जीव ) दोनोको ही वतला सकता दै। यदि वक्ता दूसरेके लिये” शब्दकों असंघात श्र्थमें प्रयोग करे जिसको श्रोता संघात अथर्मे सममा जाव्रे तो उस समय साध्य हेतुके लिझुद हो जावेगा । उस समय वह हेतु इृश्विघातकृत्‌ विरुद्ध कहलाता है ।घरमकीर्तिने अपने ग्रन्थ व्यायबिन्दुमें इसको पहिले विरुद्धका ही उदाहरण माना है। क्योंकि अनुमान वाक़्यमें प्रयेग किये हुए साध्यवाचक शब्दका एक ही अर्थ हो सकता है । और यदि कहे हुए और समझे हुए अञ्र्थोर्में सन्देह हो तो प्रकरणते पहिले वास्तविक अथ निश्चय कर लेना चाहिये । यदि प्रयोग किया हुआ अशथ्थ वास्तविक होगा तों साय और हेतुमें स्वाभाविक विरोध होगा ।विरुद्धव्यभिनारी ।दिख्नागने एक और हेत्वाभास विरुद्धाव्यभिचारी! भी माना है, जिसको उसने सेन्देहदका कारण कहा है । यह ऐसे स्थानपर होता है जब दो विरुद्ध परिणाम एक ही हेतु ( ४७)10 ५४प५7४ 7९७४०॥ ) से पु४ किये जाते हैं ।उदादरणके लिये-एक वेशेषिक दाशनिक कहता है--- शब्द अनित्य है क्योंकि वह उत्पन्न होता है । एक मीमांसक उत्तर देता है--शब्द नित्य है क्योंकि वह श्रत्य ( सनने योग्य ) है ।उपरोक्त मामले में काममें लाये हुए दोनों हेतु कऋमसे वेशेषिक और मीमांसाके शिद्धान्तके पुष्ट करनेके कारण उन २ दशनकारों द्वारा ठीक माने जाते हैं । किन्तु दो विरुद्ध परिणार्मीपर लेजानेसे वह अनिश्चित है। और इसीलिये वह हेत्वाभास है ।धमकीतिने न्यायबिन्दुर्में विरुद्धाव्यभिचारी हेल्वाभाथका निषेध (न्‍्था० फर० ८६-८८ भाषा० पृ० २४-२५ ) किया है। इसकी कारण उन्होंने यह दिया हे कि यह न तो अनुमानके विषयमें ही ठठता है और न॑ शाक्ष ही इसका आधार हे । हेतुका साध्यमें स्वभाव, कार्य या अनुपलब्धि रूपमें रहना आवश्यक हे और उसके द्वारा ठीक परिणाम निकलना चाहिये । .. परस्परविरोधी दो परिणाम ऐसे हेतुओंसे पुष्ट नहीं हो सकते जो ठीक (४४७॥10) हैं । परस्पर विरुद्ध दो परिणामोंके सिद्ध करने में दो शासत्र उसी प्रकार सहायता नहीं कर सकते जिस प्रकार एक शात्र प्रत्यक्ष और अनुमानकों पृष्ट नहीं कर सकता और बह केवल बुद्धिके न पहुँचने योग्य विषग्रोमें ही प्रमाण होता हे । इसलिये विशद्धाव्य- भिचारी श्रसंभव है । ५टष्टान्तका काय |दिदनागके विरोधमें घमकोरति ( त्रिरुपो हेतुरुक्तः । तावतैब भर्थप्रतीतिरिति न पृथग्‌ दृष्टान्तो नाम साधनायवः कश्वित्‌। तेनास्‍्य लक्षणं एथग्‌ [ न ] उच्यते गताथे- त्यांत्‌ । ( नया प० ९१ भाषा० प्ृ० २६ ) सम्भवतः न” भूलसे छूट गथा हे।




User Reviews

अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :