अनुत्तरोप पातिक दशा सूत्रम | Anuttarop Patik Dasha Sutram

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Anuttarop Patik Dasha Sutram by आत्माराम जी महाराज - Aatnaram Ji Maharaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(३) य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्स्स्स्य्स्स्स्य्ट्ट्स्टः अथाव्‌ शब्दद्वारा सर्वज्ञ आत्माओं ने उन अर्थों का वर्णन किया जो कि . अपोरुषेय हैं। करपना कीजिए कि स्वज्ञ आत्मा ले वणन किया कि आत्मा नित्य है! सो यह शब्द तो पौरुषेय हैं, किन्तु शब्दों द्वारा जिस द्रव्य का पी चर ्‌ 25 ३ े ञे चर्णन किया गया है, वह नित्य ( अपीरुषेय ) है । इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य के हक 9 जी पु 4 सर्वेज्ञग्रणीत के विपय में समझ लेना चाहिए | अतः सिद्ध हुआ कि सर्बज्ञँ्रणीत आगमों का ही स्वाध्याय करना चाहिए। ९ ० जज जा 0 संबझप्रणात आगम कान कान से हैं / वतेमान काल , में सर्वेज्ञूभ्रणीत और सत्य पदार्थों के उपदेश करने वाले ३२ आगम ही , प्रमाण-कोटि में माने जाते हैं। इन आगमों में पदार्थों का चर्णन प्रमाण और नय के आधार पर ही किया गया है। इनके अध्ययन से इन आगमों की सत्यता और इनके ग्रणेता सबेज्ञ या सर्वज्ञ-कल्प स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं । बतेमान काल में ३२ आगम इस प्रकार हैं-- “से कि ते सम्मसुअं ? ज॑ इमं अरहंतेहिं भगव॑तेहिं उप्पणण नाणदंसणधरेहिं तेहक्क निरिक्खिअआ महिअ पू्टएहिं तीयपडुप्पणण सणागय जाणएहिं सव्वएणूहिं सब्वदरिसीहिं पणीरं दुबालुसंग॑ं गणिपिडर्गं त॑ जहा-आयारो १ सूचगडो २ ठाणं ३ समवाओ ४ विवाहपणणत्ती ५ नायाधम्मकहाओ ६ उबासगद्साओं ७ अंतगडदसाओ ८ अणुत्तरोववाइय- दर्साओ ९ पण्हवागरणाईं १० विवागसुअं ११ दिद्विचाओं १२- इच्चेअं दुबालसंगं गणिपिडगं चोदस प्रुव्विस्स सम्मसुअं अभिण्ण दस पुव्विस्स सम्मसुअं तेणपरं भिण्णेसु भयणा सेत॑ सम्मसुअं। . .. नंदीसूत्र (सू० 2० ) १५ अंगशा८्र, १२ उपांगशासत्र, ४ -मूलशाखर, ४ छेदशास्र और शी.




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