कठोपनिषद॒ | Katopanishad Bashyam

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Katopanishad Bashyam by श्री शंकराचार्य - Shri Shankaracharya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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छत: प्राथयस्व' (क5० १।१-२३-२५) इत्यादि प्रलोभन दिया, किन्तु लचिकेत अत्येस्य' इत्यादिये ग्रनात्मपदार्थों में दोषदर्शन दिखाकर साधनचतुष्टयसम्पन्न श्रार्त्म झपना परिचय दिया। इस प्रकार जब यसराजने अनुभव किया कि वे लौकिक एवं तोगों से सवंधा उदासीन हैं, उसमें मुमुक्षारूपी श्रग्नि तेजीसे धधक रही है तो &न्तिके लिए ज्ञानामृतकी' वर्षा करनी पड़ी वह ज्ञानामृत वर्षा ही सभी लोगोंब #रनेके लिए श्राज भी कठोपनिषद्‌के रूपभें विद्यमान है । विशुद्ध बोधरूप अंव ह&दयरूपी विशुद्ध ध्ृमिमें स्फुट हो सकता है जो नचिकेताके समान साधन च छ । मेष जल तो सब जगह बरसाते हैं, परन्तु परिणाम भिक्-भिन्न भूमियाँ खुसार भिन्न-भिन्न होता है। ठीक यही बात शास्रोपदेशके विषयर्म भी है । <&आवरक्षपा तो सभीपर समान है परन्तु आ्रात्मकृपाकी न्यूनाधिकताके कारण उस धरिणार्मोंमं श्रन्तर रहता है। 'ज्ञानादेव तु कैवल्यम” ऋते ज्ञाताजमुक्ति थ्य तिवाक्य तत्त्वज्ञानसे ही मोक्षकी प्राप्ति कहते हैँ, श्रतः उसे प्राप्त करनेके हि स्ॉम्पादन करनी चाहिए, क्योंकि 'इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहा थलिनष्टि ( केन० २॥५ ) इस श्रुतिके अ्रतुतार भाववजीवनका परम ला स्छपयोगिता ) श्रात्मप्राप्तिमें ही है। प्रतः भात्माको यथार्थरूपसे जानना ही' आधथम कतंव्य है । अ्रन्य उपनिषदों के समान इस उपनिषद॒पर भी भगवत्पाद जगदुगुर श्रीमद ध्वायंमे संस्क्ृतभाषामें सरल एवं सुबोधभाष्यकी रचना की है, संस्कृतमेँ हो ज्वनसाधारणको उससे पूरा लाभ होना कठिन है, प्रत३ मन्त्रों के प्रत्येक वर्णाक पर्याय देकर उसका हिन्दी अनुवाद भी किया गया है तथा भाष्यका सरल सुर अाजुवादकर भाष्यके तात्पयको श्रतिस्पष्ट करनेके लिए उसपर भ्रनेकदर्शनों एवं दी' आ्ाधारपर हिन्दीभाषाम 'सत्यानन्दीदीपिका” प्रस्तुत की गयी है, श्राशा है. कि आस ग्रत्थरत्मसे पुरा-पूरा लाभ उठा सकेगे । ' उपतनिषद्‌ शब्दाथ आअत्र चोपनिषदछब्दो ब्रह्मविद्य कगोचर: । तच्छुब्दावयवार्थस्य विद्यायामेव सं५ उपोपसर्ग: सामीप्ये तत्नतीचि समाप्यते । सामीप्यतारतम्य॑स्य विश्रान्ते: स्वात्मनीक्ष जिविधस्य सदर्थस्य निशब्दो5पि विशेषणुम्‌ | उपनीयेममात्मानं ब्रह्माउ्पास्तद्वय॑ निहन्त्यविद्यां तज्जं व तस्मादुपनिषद्धवेत्‌ । निहृत्यमर्थमूलं साउविद्यां प्रत्यक्तथा गमयत्यस्तसम्भेदमतोीं. वोपनिषज्धवेत्‌ । प्रवृत्तिहेतुनिस्दोषांस्तन्यूलोच्छेदक्त्व यतोशसादयेद्िदया तस्मादुपनिषद्धवेत्‌ । यथोक्तविद्याहेतुत्वाइग्रन्थोषपि तब




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