चतुर्भाणी | Chaturbhani (guptakalin Shrangar)

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Chaturbhani (guptakalin Shrangar) by डॉ मोतीचंद्र - Dr. Motichandra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दर अआतुर्मांगों श्री रामक्षष्ण कवि ने जो संस्स्रण मूलमाग्न छापा था, पद अय सपा दुष्प्राध्य दे । अतएव भारस्भ से दी मेरी इच्छा थी कि इस पिशिष्ट प्रस्थ पो हिन्दी क्नुवार और टिप्पणी भादि के साथ सुटभ यनाया ज्ञाय | यद्यपि इन चारों भार्णो का त्रिषय गुप्तकारीन चेश याश्यारदाद का आँख देखा वर्णन दे मिस सैतिक धरासल विपयाजुयूछ ही अवर हे, पर वेश सस्कृति का जो सर्वांगपूर्ण चित्र इनमें प्रस्तुत रिय्रा गया दे भौर भाषा का जैसा अदुमुत नमूना इनमें है, उनकी द॒ए से ये सरह्तसादित्य के लिये अनमोल उपछब्धियाँ है । गुप्त युग की स्वर्ण सस्कृति का पक अतीब उउ्बछ पच्द कछा साहित्य-ध्म के रूप में था।पर उस समय भी द्वा्टवाम के मानर इस लोक में ये मिनऊे ज्ोउन की नियंस्ताओं ने रुच्छझूटिक भौर दशहुमारचरित जसे प्रस्थी को ऊपर उद्दाला । चतुर्माणी को उसी पिद संस्कृति के मन्‍्धन की दहेँद़ी कहना बादिएु। कालिशास भौर याण ने वारविछासिनी जीवन का उद्दाम वर्णन किया है। ये मद्दाकाल शिपर के मन्दिर में मेंसटा की झफार के स्राथ साम्ध्य सृस्य करतीं और राजप्रासाईों के तिशेष उत्सवों में नृपुरों की उमर के साथ भाग टेती थीं। उनके द्वाट में शक्कर हुण अपरास्त माएय भादि देशों के रईपज़ादे भौर उच्च सरकारों कर्मचारी चकर ढगाते थे । पॉँधरव' जीवन का बह पुक विशेष पढ़ या जिसके सम्बन्ध की प्रभूत सामप्री सस्कृत सादिध्य से एकत्र की जा सकती दे। उससा कुध नमूना श्री मोतीचन्द्र जो मे अपनी भूमिका में दिया है। चनुर्भागो के पदुमप्राभश्तक भौर पाइत्तादितक दो भाणों को 'एष्टभूमि उज्लपिनी एप घूत्त- विशसयाद तथा उभयवाभिसारिका इन दो की पाटछिष्ृत्न है। इसके बर्णनों में बस्त, वेष, शिकप स्थापस्य, चित्र, खानपान, सृत्य, सगीत, कला, शिष्टाचार भादि के सम्प््ध की बहुमुएय रोचक सामग्री पाई जातो है। द्विन्दी भनुषाद के चीचे तिस्वृत शब्द द्विष्पणियाँ दी गई है। उनमें इन सभी शब्दों भौर सस्थाभोपर गुप्तकालीन सांस्कृतिक सामग्रोफे तुलना मक अध्ययन के भाधार पर प्रकाश ढाला गया है। दमने अपने 'हपंचरित-एक सांस्कृतिक अध्ययन! भौर 'कादस्वरी- पुक सांस्कृतिक भषध्ययन शोक ग्रन्थों में इसी शेलो का भजुसरण किया है। उनमें भी उत्तर गुप्तकाछीन सस्कृति का हों वर्णन है। घतुर्भागों बचम रातों की रचना हैं, भयात्‌ बाण से एगभग दो सौ बप॑ पहले की ठैठ गुप्त युग की सास्कृतिक एष्टभूमि इन माणां में है। उदादरण के छिये, वेश में गाणिकाओं के सहाप्रासादी का वणन स्यापत्वा की धर से बहुता ही भब्य है ( पादतादितक ३३।८-१८ ) जिसमें छगमग पचास पारिभाषिक शब्दी का प्रयोग हुआ है। ऐसे ही वेश के मतोबिनोद ( पाद० ३३-३६) नौर खबर चैप्टाभों ( प्राद० 4००1-१० ) के उद्रलम्त चित्र उस युग की सटीक शब्दावली में उतारे गए है। इनमें किश्ली बाण जे चित्रगाद्दी सादित्यिक की ठेखना का चमकार दिपा हुआ है । श्री रामकृष्ण कवि का संस्करण केपछ एक प्रति पर आध्िित था, जैसा आरम्भ में कहा श्रा है । पर ६६४२२ के बाद खोज करने पर इन भाणों को भौर भी हस्तलिखित प्रतियाँ भ्राप्त हुईं। मेरे मित्र श्री डा बो० राघवन्‌ , ससस्‍्ट्त विभागाध्यक्ष, सदरास व्श्वविद्याशय ने अपने पत्र दिनाऊ २४ मई १३५४५ में उन सबको एक सूची मेज्नी दे जो लत में परिशिष्ट रूप मेँ सुद्वित की जा रहा है। इसी बीच अग्सटर्डम ( हालेंड ) के श्री जे० जार० ए० छोमाव का ध्यान चहुर्भाणी की ओर गया। उन्होंने भारतवपे जाकर इसकी मूछ प्रतियों की परीक्षा




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