त्रिपुरा रहस्य | Trpura Rahasya

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Trpura Rahasya  by श्री सनातनदेव जी महाराज - Sri Sanatandevji Maharaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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न श्र तद्भवधरणदन्द तत आसादित मया। अन्चो जनममायोगमिवात्यन्तसुखाबहम्‌ ॥ १२ ॥ तनन्‍्मे न विदितं किख्ित्संव्तेयुनिराद यत्‌। श्रुतव॑ माहात्म्यममखिले. त्रिपुरामक्तिक्ारर्म ॥ १३ ॥ सा मबद्गपिणी देवी हृदि नित्यं समाहिता। एवं में वत्तेमानस्प कि फल समवाप्यते ॥ १४ ॥ भगदन्‌ कृपया ब्रहि यत्संवर्चें: पुराचदत्‌। अविदित्वा च तन्नास्ति कचिच्र कृतकत्यता ॥ १५॥ तदुक्तमबिदिता तु यद्यघ्च॒क्रियते मया। तद्घालक्रीडनमित्र ग्रतिमाति समन्तत) ॥ १६ ॥ पुरा मया हि बहुझ्ः ऋतुभिदेक्षिणोच्छये: । प्रभूतान्नगणरिण . देवाः झक्रमुखा ननु॥ १७॥। अनः में वहाँ से आपके चरणयुगलकी शरणमें आया हूँ, जैसे कोई [ अऊेला मटकवा हुआ | अन्चा अत्यन्त सुखदायक्क जनसमाजमें हा लाय ॥ १९॥ झुरूसे संत्रत्ते मुनिने जो छुछ कहा वइ मेने कुछ भी नहीं समम्दा | आपके झुखारविन्दस पहले मेने भ्रगबती ज़िपुरामें सक्तिमाव जागृत करनेबाला माहात्न्य पूरा सुना था॥ १३॥ बड तिपुरादेबी साक्नाव आपका ही स्वरूप है। बह सदा नेरे इंदयममें विराजमान ६। इस स्थिति रहते हुए मुझ किस फलकी प्रापि होगी॥ १४९ ॥! इसके सित्रा भगवन्‌ ! संवत्तेज़ीने मुझसे पहले जो बात कही थी, कृपया बाद भी समम्ता दीजिये, क्योंकि उसे बिना समझे कभी ऋृनकृत्यवा प्राप्त नहीं हो सकती! १५ ॥। उनेी कही हुई बातह समझे बिना में जो कुछ भी करता हूँ वह ऊुझे सब प्रकार बचोंछ्ा खेल-सा ज्ञान पड़ता ह॥ र६1 पूकालमें मैंने य्ोंढाराइन्द्रादि देवताओंकछा पूजन किया था। उन चत्नोर्मे बड़ीचड़ी दक्षियाए५ँदँ दी थीं और खूब अन्नदान किया था।। ?७वा




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