उत्तराध्ययनसूत्र भाग - 1 | Uttaradhyayan Sutra Bhag -1

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
15 MB
कुल पष्ठ :
340
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)विनय श्रुत १३
“ अन्बबाते- उपुझे- गुर के तत पूछे बिन किंध- कुछ भी नतागर-- नबोले,
वा-< अथवा, पुद्दो- पूछने पर, अलियं-- असत्य, न वए-- न बोले । कोहं-- क्रोध को,
असच्चे-- असत्य-विफल, कुव्बेज्जा-- कर दे । अषियं-- (गुरु के द्वारा कहे गए) अप्रिय
वचन को भी, पियं-- प्रिय (हितकारक) मान कर, धारेज्जा-- मन मे धारण करे ॥१४ ॥भावार्थ- अनुशासन की दृष्टि से विनीत शिष्य का यह कर्त्तव्य है कि वह गुरुजनो
के बिना पूछे, बिना प्रयोजन कुछ भी न बोले । तथा उनके द्वारा डाटे-फटकारे जाने पर भी
क्रोध न करे । ध्यान रखते हुए भी कदाचित् मन मे क्रोध उत्पन्न हो जाए तो उसे विफल कर
दे, अर्थात्- ज्ञानबल से क्रोध को शान्त कर ले । कदाचित् गुरुदेव कोई अप्रिय (कठोर) बात
भी कह दे तो उसे प्रिय (हितकारक) मान कर हृदय मे धारण करे । (अथवा प्रिय अथवा अप्रिय
गुरुवचन के प्रति राग-द्वेष न करता हुआ समभाव से ग्रहण करे )) ॥१४ ॥
आत्म-दमन और पर-दमन का अन्तर एवं फलमूल-- अप्पा चेव दमेयव्वो अप्पा हु खलु दुद्दमो |अप्पा दंतो सुही होइ, अस्सि लोए परत्थ य 1१५ ॥
संस्कृत-छाया-- आत्मा चेव दमितव्य; आत्मैव खलु दुर्दम* ।
आत्म दान्त* सुखी भवति, अस्मिल्लोके परत्र च ॥१४ ॥
पद्यानुवाद-- आत्मा को वश करना है, कारण आत्मा ही दुर्दम है ।
इस भव परभव मे सुख पाए, जो दान्त आत्मा सक्षम है ॥१५ ॥
मूल-- वरं मे अप्पा दंतो संजमेण तवेण य ।
माउहं परेहिं दम्मंतो बंधणेहिं वहेहि य ॥१६ ॥
संस्कृत-छाया-- वर मयात्मा दान्त , सयमेन तपसा च ।
माऊह परैर्दमित,, बन्धनैर्वघैश्च ॥१६ ॥
पद्यानुवाद-- अपने द्वारा तप सयम से, दमन स्वय का है अच्छा ।
वध-बन्धन द्वारा परजन से, है दमन नही लगता अच्छा ॥१६ ॥अन्ववार्थ- अप्पा चेव-- अपनी दुष्ट आत्मा का ही, दमेयव्वो-- दमन करना चाहिए ।
अपा हु- आत्मा (कषाय-आत्मा और योग-आत्मा) ही, खलु-- वास्तव मे, दुद्ययो--
दुर्दमनीय-दुर्जय है । दंतो-- दमन किया हुआ-दान्त, अप्पा-- आत्मा, अस्सिलोए-- इस लोक
में, य-- और, परत्थ-- परलोक मे, सुही-- सुखी, होइ-- होता है ॥१५ ॥संजमेण तवेण य-- सयम और तप से, मे अप्पा-- मुझे अपनी आत्मा को, दंतो-
दमन-वश करना, वरं-- अच्छा है । अहं-- मेरा, परेहिं -- दूसरो के द्वारा, बंधणेहिं-- बन्धनो
से, य-- और, वहेहि-- प्रहारो से, दम्मंतो-- दमन किया जाना, मा-- अच्छा नही है ॥१६ ॥
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