श्री लोकाशाह मत - समर्थन | Shri Lokashah Mat Samarthan

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
7 MB
कुल पष्ठ :
248
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( १४ )
श्रीमान लॉकाशाह के विपय में पूवे व पश्चात् लेखनी
उठाई है और गाहिया अदान की है उनका धमाण देच। सर्वे
था अन्याय है ।
यदि अभ्यासी बन्धु जरा प्रोढ़ बुद्धि से विचार करते तो
उन्हें सर्यवत् प्रकट मालूम देता कि--जिन महापुरुष को में
सामायिऊ, दया, दानादि के उत्यापक कद्दने की छुप्टता
करता हैं, जरा उनके अलुयाइयों की ओर तो मेरी अवलोकन
दृष्टि डालू कि-- वे उक्त क्रिया: फरते हैं या नहीं? यदि
इतना कष्ट भी आपने किया द्योता तो यद्द बृहद् भूल करने
का अवसर नहीं आता!
अरे अन>भ्यासी पन््धघु ! जरा लॉकाशाह के अल्ुवाइयों
फी शोर तो आंस उठाकर देखो, उनके समाज में सामा
यिक, प्रतिपूर्ण पीपध, प्रतिकरमण, त्याग, प्रत्याय्यान, दया,
दान आदि किस प्रकार प्रचुर परिमाण में होते है| उम्रऊे
सामने तो आपकी सम्प्रदाय में उक्त क्रियाएं ब्रहुन स्पृटप
मात्रा में दोती हैं । फिर आपका अभ्यास रहित वाक्य किस
प्रकार सत्य द्वो सऊता है ? क्या जिस समाज में जो क्रियाएं
प्रचुर्ता से पाई जाती दे उनके लिए उनक पूर्वजों को उत्था
पक्र कह डालना भूखता नहीं है ” अतएव लॉकाशाह मत
समर्थन में जो मृतिपूज्ना विषयक तिचार किया गया हे
चद्द जाकाशाह मत समथन झवश्य हैं ।
२--अन>भ्यासी बन्धु लोकाशाह के लिए इस्लाम स-
सुक्षति फी डुद्वाई देते हैँ, इस विपय में अधिक नहीं लिफ
कर फेधतल यदी निवेदन किया जाता है क्लि भाई साहर
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