वन एवं वन्य जीव संरक्षण क्यों और कैसे | Van Avam Vanya Jeev Sanrakshan Kyon Aur Kaise

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Van Avam Vanya Jeev Sanrakshan Kyon Aur Kaise by राम किशन डेलू - Ram Kishan Delu

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हुए वृक्ष नही कट्टणा, यह सका म्ज्त्य-_ जम्भसार [श] कुऐँ में मांग पड़ गई हैं, इस राम्वध में कोई कुछ भी सुनने और समझने को तेयार नहीं हैं । सबसे ज्यादा असरने याली बात तो यह है कि खेजड़ियों के पेड़ों की सुरक्षार्थ प्राण गवाने वाले सैकड़ों बलिदानियों की सतति की रगों में दौड़ने याला खून भी ठण्डा पड़ घूका हैं। अब पेड़ों की रक्षार्थ जान लड़ाना तो दूर, कोई इनके विनाश फी और आंख उठाकर भी नही देखता, यह कदु सत्य है। खेजड़ियों के अलावा हमें इस क्षेत्र में मौजूद फौग, खींप, सिणिया कैर, घास और विविध औषधीय वनस्पतियों की सुरक्षा पर भी विचार करना होगा । क्योंकि मानवीय दखल के कारण उपरोक्त वनस्पतियों का दायरा चिताजनक ढंग रो सिमटता जा रहा हैं। उनमें कई मरूस्थलीय औषधियों की प्रजातियाँ तो विलुप्त हो गई है । कई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं । रौवण, भुरट व घास के मैदान सिमट जाने से जहां एक तरफ पशुओं के लिए घास, चारे और चारागाह की गभीर समस्या उठ खड़ी हुई हैं। वहीं दुसरी ओर वनस्पति रहित बालू रेत आंधियों से उड़-उड़ कर सिचित नहरी क्षेत्र को बरानी भूमि में तब्दील कर रही हैं, और भूमि को बजर बना रही है । ऑधियों से चलायमान घूल सड़कों व रेल पटरियों पर परर कर जनजीवन में परेशानी का सदब बनती जा रही हैं। जहां तक हरे पेड़ों की कटाई का प्रश्न है अकाल के हालात में खेजड़ी आदि हरे पेड़ों की कटाई ज्यादा हो रही है । खेजड़ी की लकड़ी ईमारती फर्नीचर की बजाय मात्र जलावन के काम में आती है । इसकी विशेष उपयोगिता नही होने के बावजूद इन्हे काटने वाले लोगों ने खेजड़ी कटाई को रोजमर्रा का धघा बना लिया है और ऐसा करने वाले पेशेवर लोग मौजूदा कानून की खामियों का नाजायज फायदा उठाकर खेजड़ी आदि वृक्षों को काट-काटकर ईट भट्टों जिप्सम व चुना पकाने तथा मावे की भट्टियों में पहुचा रहे हैं। ऐसे स्थानों पर जगह-जगह इन काटे गये पेड़ों के ढेर के ढेर देखे जा सकते हैं | खेजड़ियों के कटे पेड़ों के त्तनों रो लदे ऊँट गाड़ो की लम्बी-लम्बी कतारें रात्रि को एवं सुबह के समय शहरों की तरफ जाती हुई कभी भी देखी जा सकती हैं। इन पर लदे पेड़ों के तने देखकर सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि रोजाना दिन भर में कितनी खेजड़ियों की वलि चढती होगी 1 .. नह री क्षेत्रों में सिचाई सुविधा से किसानों एव वन विभाग द्वारा 20-25 वर्ष पूर्व लगाये गये हरे पेड़ों की बर्बादी का किस्सा तो और भी ज्यादा खौफनाक हैं । वर्षो पूर्व नहरो व उप नहरों के किनारे लगाये गये अधिकाश लाखों हरे पेड़ वन विभाग द्वारा राजस्व अर्जित करने के लालच में काट डाले गये । जब कि सरकार का यह कदम उचित नही है | विशेषकर बीकानेर जिले के रेतीले क्षेत्र में जहा से नहरें गुजरती है वहां पर नहरों के अलावा आस-पास बहुत कम संख्या में हरे पेड़ मौजूद है। इस कारण इस क्षेत्र में अन्य क्षेत्रों की तुलना में वर्षा सबसे कम होती हैं | और बीकानेर से लेकर जैसलमेर तक नहर के अतिम छौर तक नहर के ईर्द गिर्द अधिकाश क्षेत्रों में रेतीले टिब्बे हैं | अतः इस क्षेत्र में महरों के किनारे खड़े हरे पैड़ों को काटना बर्बादी को निमत्रण देने के समान हैं | क्योकि पेड़ों कमी से वर्षा तो कम




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