मनस्विता प्रखरता और तेजस्विता | Mansvita Prakharata Aur Tejasvita

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Mansvita Prakharata Aur Tejasvita by ब्रह्मवर्चस - Brahmvarchas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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समाज की दष्वृत्तियाँ अपने अस्तित्व के प्रति खतरा देखकर भड़क उठती है और विरोध के रूप में 'सामने आ जाती है। चूँकि सत्रवृत्तियाँ विरोध-भाव से शून्य होती है इसलिए वे बुराई का विरोध करे से पूर्व सुधार का प्रयल कसी हैं। ध्वंसरातक न होने के कारण वे बुराई के विरोध को भयंकरता के रूप में उपस्थित नहीं करती, जिससे ऐसा नहीं दीखता कि 'बुरगाई का विरोध हो रहा है। दुष्प्रत्तियों के उफान को, किसी ध्वंसात्मक संघर्ष को” बचाने के लिये सत्म्रवृत्तियाँ किसी सीमा तक उसकी उपेक्षा करती हुई यह प्रतीक्षा किया करती है, कदाचित्‌ यह स्वयं सुधर जाये। किल्तु जब ऐसा नहीं होता तो सत्परवृत्तियोँ अपने ढंग से आगे बढ़ती हैं और बुराई को दूर करे का अयल करती है। घ्वंसरात्मक होने के कारण दुष्प्रवृत्तियों सत्रवृत्तियों के विशेध मे एक संघर्ष खड़ा कर देती है, जिससे संत्मवृत्तियो को अधिक विशेध दृष्टिगोचर होता है। इसके विपरीत सत्वृत्तियो के द्वार संघर्ष के स्थान पर सुधार का प्रयल करने के कारण बुराई का विरोध होते नहीं दीखता, जबकि सत्ववृत्तियो का विशेष अधिक फलदायक तथा स्थायी होता है। जहाँ तक इच्छाओ का सम्बन्ध है, सदिच्छाएँ ही इच्छाओं की सीमा मे आती हैं इसके विपरीत जो असद्‌ इच्छाएँ है वे वास्तव में इच्छाएँ न॑ होकर दुष्प्रवृत्तियो का अविग ही है। सदिष्छाओ की शक्ति अपरिमित है। कोई अच्छा कार्य करमे अथवा उदात्त लक्ष्य प्राप्त करे को कामना रखने वाला लाख विरोेधो एवं असुविधाओ के होने पर भी अपने ध्येय पर पहुँच ही जाता है। ; सदाशबी मे एक स्थायी लगन होती है, जिससे वह अपने ध्येय के प्रति निष्ठावान्‌ होकर अपनी समग्र शक्तियों की लगाकर प्रयल में लगा रहता है। इच्छा एवं प्रयल की एकता उसमे एक अलौकिक सहायता-स्रोत का उदघाटन कर देती है, जिससे उसके प्रयलो मे निरनन्‍्तरता, तीव॒ता और अमोधवा बढ़ती जाती है और वह क्षण-क्षण ध्येय की ओर उत्तरोत्तर अग्रसर होता जाता है। संदिस्छावान्‌ व्यक्ति मे आशा, उत्साह, साहस और सक्रिय की कमी नहीं रहती और जिसमे इन सफलठावाहक गुणों का समावेश होगा, असफलता उसके पास॑ आ ही नहीं सकतो। असद्‌ इच्छाये जहाँ अपने विषैले प्रभाव से मनुष्य की शक्ति का नाश करती हैं, वहाँ सदिच्छाएँ उनमे नवीन स्फूर्ति, नया उत्साह और अभिनव आशा का सचार किया करती है। एक इच्छा,- एक निष्ठा और शक्तियों की एकता अनुष्य को उसके अभीष्ट लक्ष्य तक अवश्य पहुँचा देती है। इसमे किसी भ्रकार के सन्देह की गुन्जाइश नहीं। मनस्विता, प्रखतता और तेजस्विता. १.१३ इच्छाशक्ति' द्वारा असम्भव को सम्भव बनाया जा सकता है व्यक्ति किसी कार्य-विशेष मे सफलता पाने के लिए कृत संकल्प हो जाय और अध्यासशअ्रयाप्त उस दिशा में निरन्तर जारी रखे तो कोई कारण मही कि वह सफल न हो सके। शरीर क्रिया क्षेत्र में आये दिन योगाभ्यासियो द्वाग ऐसे हो क्रिया-कौठुक प्रदर्शित किये जाते रहे है, जिन्हें देखने न सहज विश्वास तो नहीं होता, पर वैज्ञानिक निरीक्षण- के दौरान वे बिल्कुल सही पाये गये और उनकी इस क्रिया-कुशलता को सर्वसम्मति से स्वीकारा गया। | ऐसा ही एक, प्रयोग-परीक्षण “हाट्वर्ड इंस्टीट्यूट फॉर साइकिक एंड रिसर्च” की ओर से डॉ. थेरेस ब्रोसे नामक एक मत शरीर विज्ञनी के संरक्षण में आयोजित किया गया।. लिए वे अपने मित्र डॉ. माइलोबेनोविच के साथ योग की विलक्षणताओं की शोध करने के लिए भारत आएं। अपने प्रयोगो के दौरान उनने अपने सन्देहों के निवारणार्थ कई प्रकार की जाँच-पड़ताल के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले, उसमे दिल की धड़कन बिल्कुल बन्द कर लेने का दावा भी उनने सही पाया। ऐसे योगी तो काफी संख्या मे मिले जो सामान्यतथा ७२ बार -प्रतिं मिनट की धड़कन को ३० तक घटा लेते है। ३ दिन से २८ दिन तक बिना साँस लिए, बिना अल-जल ग्रहण किए, बिना' मल-मूत्र विसर्जन किए समाधिस्थ रहने वाले योगियो मे से अधिकांश के दावे सही पाए गए। उनके संज्ञाशून्य होने की बात उनका हाथ बर्फ मे दवाएं रहने और आग का स्पर्श करने पर भी परीक्षाएँ खग्ी उतरीं। एक योगी संकल्प-बल से जिस भी अंग से कहा जाता उसी से पसीना निकाल सकते थे। इससे उनने पूर्वार्त अध्यात्म के भर्म को समझा व पाश्चात्य जगत में भारत के वास्तविक स्वरूप को प्रकट किया। यही नहीं, एक बार लच्दन में एक भारतीय योगी ने सन्‌ १९२८ मे ऐसा ही सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। उसने नाड़ी की गति को न्यूनवम २० और अधिकतम १२० करके डॉक्टर को आश्चर्यचकित कर दिया।' वह अपनी, माँस-पेशियो और त्वचा को इतनी कड़ी कर लेता था कि सामान्य हथियायें का उस पर कोई प्रभाव भहीं पड़ता था। पु - साम्राज्ञी मेरी लुईस के बारे मे कहा जाता है कि वे अपनी इच्छातुसार अपने कानों को बिना हाथ से छुए, किसी भी दिशा मे मोड़ सकती थी और आगे-परीछे हिला सकती थी। इसी प्र्धर एक फ्ंंसीसी अभिनेता इस बात के लिए प्रसिद्ध था कि वह अपनी इच्छानुसार अपने बालो का नचा सकता था। बालों को ' गिराने-ठठाने, इधरूउधर घुमाने व घुँघराले बनने की क्रिया में उसे महारत हासिल थी। अक्सर वह अपनी इस अदभुत क्षमता




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