नीतिसार भाग 1 | Neetisaar Bhag 1

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Book Image : नीतिसार भाग 1  - Neetisaar Bhag 1

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अड्डा + सम्पूर्ण नीतियाका सार * भगवत्पाप्ति + रद कफ फफ़ कफ कफ फफफ कफ कफ फफ कफ कफ फफ कफ फ कक फीफा कफ कफ कफ फ कफ कफ फ कफ ऋ के के ऋ फ फ फ के कक का की कफ की के भा के फेक फ कफ फफे कफीिफ कर रखा हे, जो सरलतापूर्ण व्यवहार करता है और समस्त प्राणियाका हितैषी है, जिसको अतिथि प्रिय हैं, जो क्षमाशील है, जिसने धर्मपूर्वक धनका उपार्जन किया है-- एसे गृहस्थके लिये अन्य आश्रमोकी क्या आवश्यकता है-- शीलवृत्तविनीतस्य . नियृददीतेन्द्रिस्य च1 आर्जवे.... वर्तमानस्य... सर्वभूतहितैपिण ॥ प्रियातिधेश्न क्षान्तस्य धमार्जितधनस्य च। गृहाश्रमपदस्थस्य किमन्ये. कृत्यमाश्रमै ॥ (महा०, अनु० अ० १५४९) महान्‌ आश्चर्य--भगवान्‌ शड्टर भगवती पार्वतीस कहते हैं-देवी। यह महान्‌ आश्चर्यकी बात है कि मनुष्याकी इन्द्रियाँ प्रतिक्षण जीर्ण हो रही हैं आयु नष्ट होती जा रही है आर मौत सामने खडी है, फिर भी लागाका दु खदायी सासारिक भोगाम सुख भास रहा है, जम्म-मृत्यु और जरासम्बन्धी दु खासे सदा आक्रान्त होकर ससारम मनुष्य पकाया जा रहा है ता भी वह पापसे उद्धिय्र नहीं हो रहा है-- जन्ममृत्सुजरादु खै... सतत... समभिदुत । ससारे पच्यमानस्तु पापानोद्धिजते जन ॥ इस प्रकारका नीतिबोध प्रदान कर भगवान्‌ श्र मनुष्याका सदा सन्मार्गपर चलने अपने विहित कर्तव्यकर्मको करते हुए भगवान्‌कों सतत याद रखने और उन्ह कभी न भूलनेका सदेश हम प्रदान करते है। देवराज इन्द्रका नीति-तत्त्व-रहस्य वेदाम देवताआके राजा इन्द्रकी महिमाका विशषरूपसे वर्णन हुआ हे। एक वारकी वात है जब नीतिधर्मोक 'उच्छेदक वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्र इन्द्रलोकम लौट तो उस समय सभी देवताओं और महर्पियाने उन्हे 'बहुत सम्मानित किया। उसा समय उनके सारधि मातलिने हाथ जोडकर उनसे पूछा--भगवन्‌। जो सबके द्वारा वन्दित होते है, उन समस्त देवताआम आप अग्रगण्य हैं परतु आप भी इस जगतमे जिन महापुरुषाकों नीतिधर्मतत्त्वज्ञाको प्रणाम करते हैं वे कौन है, बतलानेकी कृपा करे। इसपर देवराज इन्द्र बोले-मातले। धर्म अर्थ और कामका चिन्तन करते हुए भी जिनकी चुद्धि अधर्मम नहीं लगती में प्रतिदिन उन्हींको नमस्कार करता हूँ-- धर्म चार्थ च काम च येपा चिन्तयता मति । नाधमें वर्तते नित्य त्तानू नमस्यामि मातले॥ (महा० अनु० ९६) हे मातले। जो अपनेको प्राप्त हुए भोगाम ही सतुष् हें 'दूसरासं अधिकको इच्छा नहीं रखते हें, जो सुन्दर वाणी बालते हैं और बोलनम कुशल हैं. जिनम अहड्डार तथा कामनाका सर्वथा अभाव है तथा जा सबस पूजा पानयाग्य ह उन्ह मे नमस्कार करता हूँ स्वेषु भोगेपु सतुट्रा सुवाचो वचनक्षमा । अमानकामाश्चाध्यर्हिस्तिनू नमस्यामि मातले ॥ 'तीर्थोकी महिमा--देवराज इन्द्रने गड्जादि तीर्थोम श्रद्धा- भक्तिपूर्वक स्रान--अवगाहन करनेकी प्ररणा प्रदान की हैं इतना ही नहीं वे कहते हें कि तीर्थोका मन-ही-मन स्मरण करके सामान्य जलम भी उन तीर्थोकी भावना करनेसे उन तीर्थोंम जाकर स्रान करनेका फल प्राप्त हो जाता हैं। मनुप्यको 'चाहिये कि वह कुरुक्षेत्र, गया, गड्ा, प्रभास और पुप्कर क्षेत्रका मन-ही-मन चिन्तन करके जलम स्नान कर ऐसा करनसे वह पापसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है जैसे चन्द्रमा राहुके ग्रहणसे-- कुरुक्षेत्र गया गड्ठा प्रभास पुप्कराणि च। 'एतानि मनसा ध्यात्वा अवगाहेत्‌ ततो जलम्‌। तथा मुच्यन्ति पापेन राहुणा चन्द्रमा यथा ॥ (महा०, अनु० १२५ | ४८-४९) सबसे बड़ा तीर्थ गोसेवा--देवराज इन्द्र बतात है कि गौआम सभी तीर्थ प्रतिष्ठित है, जो मनुष्य गायकी पीठ सता है ओर उसको पूँछको नमस्कार करता हैं वह मानो तीर्थोम तीन दिनातक उपवासपूर्वक रहकर स्रान कर लेता है-- ज््यह स्रात स भवति निराहारश्र वर्तते। स्पृशते यो गवा पृष्ठ वालधि च नमस्यति ॥ इस प्रकार सक्षेपम देवराज इन्द्रने अप्रत्यक्ष-रूपसे जो नीति-धर्मका उपदेश दिया वह बडा ही कल्याणकारी है। देवगुरु बृहस्पतिका नीतिविपयक सदेश आचार्य बृहस्पति दंवताआक भी गुरु ह। नीतिके आचार्योमे महामति बृहस्पतिजीका विशेष स्थान है। 'बृहस्पतिजीके मतम भगवन्नामका सतत स्मरण ही सर्वोपरि कल्याणकारी नीति है जो मनुष्य इसका अवलम्बन ले लता है फिर उसके लिये भगवद्धाम दूर नहीं रहता-- सकृदुच्यरित .. येन... हरिरित्यक्षरद्रयम्‌। बद्ध परिकरस्तन मोक्षाय गमन प्रति॥ (गरडपु० आचा० ११४1३) ससारकी अनित्यताको न भूले--आचार्य बृहस्पति कहते




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