विनोबा केविचार [पहला भाग ] | Vinoba Ke Vichar (bhag 1 )

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Vinoba Ke Vichar (bhag 1 ) by महादेव देसाई - Mahadev Desai

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्ट विनोबा के विचार कृष्ण-भक्ति का रोग दुनिया पैदा करें' ब्रह्माजी की यह इच्छा हुईं। इसके अनुसार कारवार दुरू होनेवाला ही था कि कौन जाने कैसे उनके मन में आया कि “अपने काम- मे भखा-बुरा वतानेवाला कोई रदे, तो वडा मजा रहेगा ॥' इमलिएु मारम भे उन्होने एक तेज तर्यार टीकाकार गढा, भौर उक्ते यह अस्तियार दिया कि आागे से मैं जो कुछ गढू गा, उसकी जाच का काम तुम्हारे जिम्मे रहा । इतनी तैयारी के वाद श्रह्माजी ने अपना वारखाना चालू किया । म्रह्माजी एक-एय' ्नीज बनाते जाते और टीकाकार उसवी चूक दिखाकर अपनौ उपयोगिता सिद्ध करता जाता। टीकाकार बौ जाच बे सामने कोई चीज बे-ऐव ठहर ही न पाती । “हाथी ऊपर नही देख पाता, ऊट ऊपर ही देखता है। गदहे मे चपठता नहीं है, वदर अत्यत चपछ है।” थो टीकाकार ने अपनी टीका के तीर छोड़ने शुरू किये । ब्रद्माजी वी अकल गुम हो गई | फिर भी उन्होंने एवं आखिरी बाशिश वर देखने वी ठानी और अँपनी सारी कारीगरी सर्च करके मनुष्य गा । दीकाकार उत्ते वारीकी से निरखने लगा । अत में एक चूक निकल ही शाई। “इमवी छातीमे एव खिडवी होती चाहिए थी, जिससे इसके विचार सय समझ पाते ।” द्रह्माजी वोछे--“तुझे रचा, यही मेरी एव चूक हुई, अब मैं तुसे दाकरजी ये हवाले वरता हु ।” यट एव पुरानी कहानी बही प्री थी । इसवे थारे में शका वरने मी मिफं एक ही जगह है। वह यह वि बहानी बे वर्णन वे अनुसार टीवावार धावरजी ये हवाले हुआ नहीं दीसता । शायद ब्रह्माजी को उसपर दया ना गईहो, या शकर ने उर्सपर यपनो शवित न आजमाई हो! जो हो, तना भच हे दि याज उनकी जाति बहुत फैली हुई पाई जानो है। छुलामी थे जमाने में बर्ुत्य बारी न रह ज़ाने पर वबतूत्व को सौवा मिलता है ॥ नाम की बात सत्म हुई वि वात वा ही बम रहता है। सौर योलना ही है




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