अभिधान राजेन्द्रः | Shri Abhidan Rajendra Kosh Vol-iv

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Shri Abhidan Rajendra Kosh Vol-iv by विजयराजेन्द्र सूरीश्वरजी - Vijayrajendra surishwarji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सके क फेक कक कक फ कई केस कल्प लेलवपल्पपेर वेन्ये्पी: कै पेल्नेल्नेननेल्नेल्नेन्ने्न: मैने नेन्मे्ने: ने ने. 23323; % 33 8; ४ ३३32: घण्टापथ: | नै बन ब् ब्र कै कै 1६८ कं#क्रककतकन + हे + +ै लेक चआे 4: दृश प्रतिपसी परिभाष्य न्गवत्सिशान्तानेरूपणम्‌ | जम्बुदप- गतमनुप्पक्षेत्रस्प चन्द्र यो3घदोनां संब्यानिदृश,, चन्द्राईभद॒पो यन्न यथा म्रमन्ति तज्रिरूपणमित्यादि एफपश्चाशदृविषयप्ररुप- णप्रस्तायें मजुष्पत्तेत्रप्ररूपणमित्थम- जबूदीबों लघणो-दृद्ी व दीवो य घायब्सडे | फालोद हिपुक्खरघर-दीव ही माण सखेत्त। १॥ एत माएसमक्त, एत्थ विचारीणि जोध्सग- णाएणि | परनों दौवसमुद्दे, जबछिय जोघ्स जाण ॥२॥ ” तत्र च- चदा सूरा य गहा, नकखसा तारया य पच घ्मे | एगे चत्नज्ञाइसिया, घटायारा थिरा झवरे॥ १४७॥ ” तथा च-“दो चदा दो छूरा, णगफ्पता खन्नु दघति उष्यध्ता। धावत्तर गहसत, जबुद्दोवे वियारीण ॥ १॥ एग च सयसहस्स, तिरी- रे +| स सखलु नये सहस्साइ । णत्र य सता पण्मासा; तारागणको- १ मिकोडीण ॥२५॥ ” सब चतत्‌ ' जोश्सिय ' शब्दे घिदक्तिव- लोकनापम । # जिनवचनमेतत्‌ जिनाउ5गर्मे-योगादेव फम- कुपों भन्ननाति तरूप योगन्य माद्दात्म्मम, तथा च योग- मार्गाधिक्रारिण , योगनिष्पक्नस्य चिह्दानि । तथादि-'' अ- लॉल्यमारोग्यमनिष्टरत्व, गनन्‍ध शुभो सूत्रपुरोपमह्पम्‌ । का- नि प्रसाद स्वरसोम्यता सच, योगग्रदु ले! प्रथम द्वि श्षिद्धम्‌ ॥ १ ॥ ” इत्यादि तिशद पिपया: “ज्ोग” शब्दे सम्पफ प्रतिपा- दिता । तथा- गुरुसक्तो अ्रपमक्तों, खतों दतों य निरुयगसोी य । थौराचिक्तो दढम्नत्तो, घिणयज्ञुतों भचविरक्तों य॥ १॥ जियक्योदों जियनिदों, हियपियमियर्जापरोें मिउ्शसत्यों । अप्पादारों अ्प्पो-चद्दी य दफ्खो छुदफ्खिन्नो ॥ ३॥ पंचस- मिभ्रों तिशुत्तो, उज्छुत्तो सजमे तवे चरण | परिसहसदु दो मुणी, विसिलशओे जागवाहि क्षि। ३॥ फयसोद्िलोयकऋ स्मे, निवासपरियाहइएण काछ्षेण | आयारपकप्पा$, लद्दिसिउ कप्प* जुर्गों ॥ ४ ? धत्यादि तु 'जोगबिटि' शबदे द्रष्टच्य म | # तथा ज़िनोक ध्यानस्थरुप, ध्यानाध्यानयोधिंचचन, ध्यानस्थेच मेरा, प्रशस्ताप्रशस्तानि ध्यानानि, ध्यातव्यभेदा, ध्यातु स्वरूप, सख्ारप्रतिपत्ततया मोक्ढ़े तुध्योन, ध्यानस्थ फन्ता नि चतयादि 'ऊाण शब्द १६६१ पृष्ठत श्रारकझुय १६७३ पृष्ठपयन्‍त छप्टध्यम्‌ । तथा च- घ्याता ध्येय तथा ध्यान, क्षय यस्थेकतां गनम्‌ | मुनरनन्याचसस्थ, तस्य दुख न बिद्यते ॥ १॥ भ्याताउन्तराध्स्मा ध्येयस्तु, परमा$शञ्मा प्रकीतिन । ध्यान चंकाअसचित्त , समार्पानिस्तदे कता॥ २॥ जिनेन्छियरुय चीशए्य, प्रशान्तस्य म्पिरा5उत्मन- छुसा55लनसस्‍्य नाशाप्र-न्यस्तनेंत्रम्य योगिन ॥३॥ रुख्घाह्ममनोत्रत्ते-धारणाधारया ग्यात्‌ । प्रसशन्नस्याप्रमक्तस्य, चिदानन्दसु वाब्िदद ॥४॥ सापम्नाज्यमप्रतिहन्द्द-भन्तरे च वितन्वत, ध्याननां नोपमा लोक, सदेघमनुजेषपि ढ़ि। ५ ॥ ”? पताइडाध्यानादराइतों रागाउ उदुपह्तचे तास्तु पर्माथेभजा- नानाउतर्स्वन्ात्रध्पे तत्स्यभावाउ3रोपणेनान्धादप्यन्चतम कामी मोदते | तत आाह- डश्य वस्तु पर न पश्याते जगत्यन्ध पुरो3चस्थित, रग़ान्वस्तु यद्स्ति तत्‌ परिहरन यज्नास्ति तत्पहयति। कुन्देन्दीचर पूर्ण चन्द्र ऊप्नशश्रीमद्ध वापन्च घा- नारोप्याउशुचिरशाशिषु प्ियतमागात्रेषु थन्मेदतें ॥ ॥ ड़ 2 486404% कर पमाररसरररसरपरपरन्‍र<फ् कक ( | डे केक कक के के केक कक कक केक नल्‍नल्कल्‍ननक तने के कतननेल्‍्क कक ज कक कि कक के के कक कक के कक कक के के कक के कक के के (६) यतोः्दद्वचनमेंबास्माफ जीवातुभूत ततस्तदलुझ्कातं 'वचकार' सितमभ चिथयेयम- ु » सष्त पणु सतत सत्त य, नव उफ्लरप्माणपयद्धपंच पर्य । तिक्तीसफ्लरचूल, खुमिरह नवकफारवरमन ॥ २ ॥ पस्तो पच्रनमुकारों, सब्यपाबष्पणासरणो । मगलाग च सब्चेसि, एडम हचहइ मगल ॥ २॥ अरिद्दतनमुक्कारों, जीव माएशइ भवसमुद्दाशो । भावेण फीरमाणो, होइ पुणे। बोहिबाजाए॥ ३॥ नमु खूप्त संक्पस्ििस्तरावनिफ्रम्य न बतेने, तन्न सक्केपचद्‌ #जनन्ताके पे नननत न तने नमन के ने: नर: फ के शा शँ का है, यथा सामायथिकसत्रमू, विस्तरवदू यथा चतुढेश पूर्वाणि, इद हे पुननेमस्फास्सन्न छुभयातात यनोउघर न सक्तेपो, नापि खिरुतरः। | +६ थ के को यदधाय सक्केप म्यात्‌ ततस्तस्मिन साने द्वख्रिथ पपर नमन | हुकारे! भवेत्‌ लिझसाधुभ्यामिति, परिनिद्ठताहदादीना सि- रूशब्देन प्रदणत्‌, ससारिणा तु साधुशब्देनेति । सखारि- णो दि धरद्देदात्नायोइ5दयों न साधुत्मतिवनन्त ॥ यप्यय वि सतरः। तद॒प्प्रयुकम। यतो विस्तशतोब्तेकत्रिधो नमस्कार प्राप्नोत्ति | तथाहि-घरारभाजितसभवा35दिज््यो नामप्राई स्व- घंतीधकरे+प + तथा भिद्धेभ्पोष्प्येफ््टिप्रिचतुप्पश्चा3शटिस- मयसिदे+पी याय्दन-तसमयसिद्धेम्प । तथा-तोथक्षिड्रप्र- त्येकयुद्धाप्पदिविशेषणायि शिप्र+्प घ्ल्यादिभिर्भदेर्षिरतरतोउन- न्तभेदो नमस्कार धराप्नोति। यतश्येत्र तस्मादसु पक्रुछ्यम- ऐीहन्य पश्दविधोज्य नमस्कारों न युज्यन शाति॥+ इह चेद प्र- तिविधानम्‌-न संफ्वेपो नापि विम्तर ध्त्येतरलिरम, स्वक्तेप स्यादस्य | फिश्व-घ्दाहदादयों नियमात्‌ साधव , तदूसुण- नामपि तत्र भाचाव । खाधवस्तु तेप्चदिदारिपु विकल्पनीया' यतस्ते न सर्वेडप्यदेदादय , कि तहिं, फेचिद्द्वन्त , येपा ती- थक्रनामकर्मादयों उस्ति, फेलित्तु सामान्यफेबलिन ,अन्ये त्था- चार्या विशिष्टरत्नाथदेंशका, अपरे तृपाध्याया' सूश्षपाउक्का', मन्‍्ये त्वेतदविशिएण सामान्यसाधव एच शिक्षकाइइयो, न पुनरद्ददादय। | तदेख सावूनामहंदादिपु व्यनिचाराद यकप्षम- स्करणेअपि नादेदाध्निमस्कारसाध्यस्थ विशिए्टस्थ फश्नलि- द्वि | नतब्व सकपेण द्विव्रिधनमस्फरणमयुक्तमेव, अव्याप- फत्थादिति | तस्मात्‌ सक्लेपतोडपि पञ्चविध एवं नमस्कारो, नतु द्विवेध , अ्रव्यापकत्वाच | घिस्तरनस्तु नमस्कचारो न विश्वीयते, अशकक्‍्यत्वात्‌ 1# नन्नु जिनव चनस्य मिथ्याद्शैन सस्तू दमयत्वेडपि प्रामाएयमन्युवगच्णदूमिनेयनिकुरम्वोपन्यास कू- तस्तप्न कि नाम नयत्वम्‌ | उच्यते-बहुधा चम्तुन' पयो याणा सभवाद्‌ विचक्धितपर्यायेण यज्ञयनमाधिगमन परिच्शे- ढोउसों नयो नाम | तथाहदि-इद द्वि जिनमते सर्वे वसुत्वनन्त- भ्रमो४5ल्‍्मकतय सक्रीणस्वसएवम्तिति तत्परिच्छेदकरेन प्रमा- शेनपपि तवेत जवितव्यमित्यलक्कीणेप्रतिनियतघरममप्रकारक- व्यवह्ारसिद्धये नयानामेत्र सामथ्यम्‌।|त्तकम- ४ निःशेपाशह्लुर्षा प्रसाणवे पर्यीभुण समासेझ'रा, बचम्तूना नियताशकल्पनपरा खपत श्लुतता55सड़ि न. ओडाम्नीन्‍्यपरायणास्तद्परे चाशे सवेयुनेया- श्रदे ऋान्तकलद्डूपद्फक लुपास्ते स्युस्तदा छवेया ॥ १॥?? नयोपपत्याठ यस्तु ' णय ? छाडदे १७४३ पूछत आरज्ष्य १६०१ पृछ्ठपयन्‍त विस्तरतो निरूपिता' | नद्धु युक्त जिनवचनमनाचरतों नियप्ताद्‌ निरया$अद्िपु पातों स्वाति, तत्र कीडर्शी यातनाष्छुचूु- कै डक पे के के ने हिल ८ कै के नरक के के कम के 4 नेट के के: के के के लेन ने पल कु तर कप न कक लक तेल कके कक कककेक के केक के क ) | । । 1 1 |




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