श्री सुदृष्टि तरंग तरंगिणी | Shri Sarsthi Targani

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Shri Sarsthi Targani by कमक कुमार जैन - Kamak Kumar Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सम्पादकीय वक्तव्य ' सत्वव्योध्यक्ष--संसार अनादिन्घिन है। इसमें रुसरण (परिम्ररुण) करनेवाले जीव अनन्त हैं। उनमें अनन्त जीव तो ऐसे हैं जो निगोद में ही अपार जन्म-मरण के असहनीय दुःखों को मोग रहे हैं और अनन्तकाल तक भोगते रहेंगे। तात्पय यह है कि उनके उक्त अनन्त दुःखों का अन्त कदापि सम्भव नहीं है। अनन्त जीव ऐसे मी हो चुके हैं जो निगोद से निकल कर काल-लब्धि को प्राप्त कर अनन्त अविनाशी शाशवतिक आत्मिक सुख को सिद्धालय में विराजमान होकर मोग रहे हैँ और अनन्तकाल तक वराबर भोगते रहेंगे। वे सब सिद्ध परमात्मा बहिरात्मा से निकल कर अन्तरात्मा बने और पश्चात्‌ अपने ही प्रवल पुरुषार्थ से परमात्म पद को प्राप्त हुए। : उन्होंने उक्त प्रमात्म पद को अन्तततोगत्वा मनुष्य पर्याय से हो प्राप्त किया, क्योंकि मनुष्य पर्याय के अतिरिक्त अन्य किसी भी पर्याय में रलत्रय-सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की परिपूर्णता स्म्भवत्तः ही हैं। गुणस्थानों की परिचर्चा से यह साफ तौर पर जाहिर है कि नारकी तथा देव चौथे अविरत सम्यग्दष्टि गुणस्थान से आगे देशविरत आदि गुणस्थानों को प्राप्त करने में स्वथा असमर्थ-अक्षम हैं। हां, तिर्यग्गति के जीव उनसे आगे का पश्चम देशविरत गुणस्थान जरुर ही पा सकते हैं, लेकिन वे भी आगे के' षष्ठ आदि गुणस्थारों व काल करने में कथमपि योग्यता सम्पन्न नहीं हैं, अतः उक्त तीनों गतियों के जीवों में रलत्रय-सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की परिपूर्णता की कल्पेना-आकांश-कुसूस के. समान असम्भाग्य ही है। . * प्रातःस्मरणीय पृज्यपांद आचार्योँ ने एक मात्र मानव को हो साक्षात्त मोक्ष प्राप्त करने का अधिकारी सिद्ध किया है। परम्परया तो सभो गतियों के जीव मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी वन सकते हैं, यह निःसन्देह है। यह सव कुछ लिखने का तात्पर्य मात्र इतना ही है कि मानव तन को पाकर के मानवोचित कर्त्तव्यों का परिपालन करके:हमें अपनी मानवता को सफल बनाना चाहिये। गुछ्रूथ्यों व्के प्यव्ट-व्कछस्त--हमारे प्रातःस्मरणीय एवं वन्दनीय महर्षियों ने हम सरीखे साधारण गृहस्थों को जो षट्‌-कर्मों के पालन करने का उपदेश दिया है--हमें उन छहों अपरिहार्य कर्तव्यों का परिपालन यावज्जीवन करते रहना चाहिये, जिनसे हमारा वर्तमान जीवन सुख शान्ति का अनुभवशील हो और भावी जीवन उससे भी बढ़ कर सुख साता के विशुद्ध वातावरण को पा सके | (१) व्वेल्-प्सूज्ञा-प्रथम कर्तव्य कर्म है--अर्थात्‌ स्ंप्रथम हमें १००८ श्रीअरिहन्त परम देव की पूजा में दत्तचित्त रहना चाहिये | उनकी सच्चे हुदय से की गईं पूजा हो हमारे लिये भव-मवान्तर में मोक्षपथ को प्रशस्तं करने का अव्यर्थ साधन है और सम्यत्तव का मूल बीज है । (2) झुरूपास्तकल्ता--दूसरा कतंव्य कर्म गुरुपासना है--अर्थात्‌ वह हमें १०८ परम दिगम्बर गुरुओं की उपासना-आराधना और चरणार्चना की ओर इक्वित करता है, क्योंकि उनकी मनसा, वाचा और कर्मणा की गईं परिचर्या पर्युपासना और गुणार्चना हो हमारी 31 21%0+43 8 में विरागता को जगाने में आद्र कारण है। उ) स्वाध्याच्य-तोसरा कर्तव्य कर्म स्वाध्याय है--वीतराग, सर्वज्ञ, सर्वद्रष्टा, हित्तोपदेष्टा, १००८ मगवान श्री अरहन्त परम देव पत्चात्मा की दिव्य-ध्वनि के प्रतोक परमर्षि गणधर देवों द्वारा ग्रथित तथा तदनुसारी परमाराध्य परम गुरुओं द्वारा रश्थिकाहगाएं अध्ययन, मनन, चिन्तन, पठन, पाठन, श्रवण, श्रावण आदि विविध सन्मागों द्वारा ज्ञान प्राप्त करना चाहिये, क्‍योंकि शास्त्र... आह्ड्िक-ज्ञान को परिप्राप्ति सर्वशा और सर्वटा असम्भव है | इस वर्तमान घिकराल करास्ितरपन्य-5८----_-्ज>ं०रीिक किक




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