सद्धर्म मण्डन | Saddhrm Mandan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ *३ |] बोल २६ वा पृष्ठ ५३ से ५ढ तक मिथ्यादृष्टि ( अज्ञानी ) को तपोदानादिरूप पारछोकिक क्रियाएं संसास्‍क्ते ही कारण हैं। सम्यग्दष्टिकी ये ही क्रियाएं मोक्षके हेतु हैँ । सुयगड्झाग झुत३ १ अ० ८ गाया २३1 २४ बोल सत्ताइसवा पृष्ठ ५६ से ६० तक मिथ्यादृष्टि ( भज्ञानी ) के घटपटादिज्ञान भी कारण विपय्येय, संबरन्‍्ध विपय्यय और स्वरूप विपय्ययक्रे कारण अज्ञान हैं। कम विशुद्धिकी उत्कर्षापकर्षको लेकर चोदह्‌ शुण स्थान कह्दे गये हैं सम्यक्‌ अ्रद्धादो लेकर नहों | ( समवायाग सूत्र ) है बोष २८ वा प्रष्ठ ६० से ६१ तक अख्रोच्चा केवछीका विभंग भज्ञान, सम्यकृत्व प्राप्तिका साक्षात्‌ कारण होने पर भी जब वीतरागैड़ी आज्ञामे नहीं है तब उसके प्रकृति भद्रवा आदि गुण, जो कि सम्य- फूत्व प्राप्तिके परम्परा कारण हैं वे आाज्ञामे केसे हो सकते हैं। ” बोछ २९ वा ६३ से ६४ तक भगवती शतक १३ उद्देशा १ के मूलपाठमे वस्तुस्बररूपकों जाननेकी चेष्ठा का नाम “ईहा ? है । उस उेष्टाके वाधक कारणोंको हटा देना “भपोह” है। सज्ञातीय और विज्ञातीय धर्मकी आलोचना करनेका नाम क्रमशः मार्गण ओर गवेपण है मत मार्गण शब्दका जिनभाषित धर्मफ्ी आलोचना ओर गवेषण शब्दका अधिक धर्मकी आलोचना _मर्थ दरैत्ा मज्ञान दे | बोल ३० वा पृष्ठ ६४ से ६७ तक उत्तराध्ययन सूत्र अ२ 3४ गाथा ३१-३२ में विशिष्ट झुक्ल लेश्याका लक्षण कहा है सामान्य शुक्डढेश्याका नहीं । जो ध्यान, श्रुत ओर चारित्र घर्मके साथ होता है वही धर्मध्यान है । हे बोल ३१ वा पृछठ ६७ से ६९ तक सस्यग्दष्टि और मिथ्यादृष्टिकी उपमा क्रमश* सुगन्‍्ध और दुर्गेन्ध घथकी नन्‍दी सूत्रकी टीकामें दी है प्राह्मण और भद्जीके घरेकी नहीं । बोछ ३२ वा पृष्ठ ६९ से ७० तक साधुको साधु समझ कर उसके निकट शी तप और सुपात्र दानकी आज्ञा मागने बाला पुरुष मिथ्यादृष्टि नहीं है पस्यप्हष्टि है। वोछ ३३ वां पृष्ठ ७० से ७! तक... सूर्व्याभ देव के अभियोगिया देवताके मिथ्याहष्टि होनेमें कोई प्रमाण नहीं है।




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