श्री जिनप्रभुसुरि | Shri Jinprabhusuri Ane Sultan Mahmmad

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Shri Jinprabhusuri Ane Sultan Mahmmad by लालचंद जी साहब - Lalchand Ji Sahab

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रास्ताविक -०ल्डंअका् आनंद-प्रमोदनो प्रसंग छे के-लगभग एक दसका पहेलां संक्षिप्त लेखरूपे प्रकाशित थयेरू अम्हारों शुभ प्रवास, विशेष समृद थइ विस्तृत स्वरूपमां जआाजे ग्रंथरूपे प्रकाशमां आवे छे. एना अन्वेषणमां-प्रामाणिक ऐतिहासिक संशोधनमां केठलो परिश्रम उठाव्यो हशे ? वर्षोना केटला प्रवत्नथी केवी केवी मुश्केलीओ बच्चे आ गवेषणा थद् हशे ! ' श्रेयांसि बहुविधानि ! सूक्तने यथार्थ प्रामाणिक करतां केवां केवां विध्नोमांधी पसार थइ आनी संकलना थइ हशे १ अने वर्षो पछी आवा ख्वरूपमां आजे आ प्रसिद्धिमां आवे छे, ते दरम्यान पण लेखकने केवा केवा प्रतिकूल संबोगो पसार करवा पद्या हशे ? ते छेखके स्वये उच्चारवुं अप्रस्तुत लेखाब. इतिहासंग्रेमी परिश्रमविज्ञ सजनो कदाच ए समनी शके. आ परिश्रम, आवा संशोधित-वधित नवीन स्वरूपमां प्रका- शर्मां आबी शकयों छे, तेनो वास्तविक सुयश, इतिहासप्रेमी गुणज्ञ जेनाचायें श्रीजिनहरिसागरसरिजी महाराजने घंटे छे, जेमना प्रेरणा-प्रोत्साहन विना आ निवंध-पशथस प्रकाशन कार्य प्राय: अशक्य थयुं होत. शासन-प्रभावक माननीय पूज्य पूरवज आचार्योना इतिहास-संशोधनमां अने तेना प्रकाशनमां असाधारण उत्केठा घरावनार उपयुक्त आचार्यना आदशैने - छृतज्ञ अन्य महा- नुभावे। पण अनुसरे-णम इच्छीशुं.




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