बेंजामिन फ्रेंकलिन | Benjamin Frenkalin

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मववदर के दो रद के दो शब्द मूँ,.भठगादर के दो शब इसमें सन्देदद नद्दीं कि दो शब्दों! की 'ाड़े में अपने वक्तन्य को विस्तृत रूप देकर में पाठकों का अमूल्य समय नष्ट करने जा रहा हूँ। उसका यद्यपि मुम से दी व्यक्तिगत सम्बन्ध है किंतु; झनेकांश में प्रस्तुत पुस्तक पर भी उसका कुछ ऐसा प्रकाश पढ़ता है जिसके लोभ को मैं संवरण नहीं कर सकता | इसी से उचिताजुचित का विचार त्याग कर अपने मनोगत भावों को व्यक्त कर रहा हूँ । 'झाशा है, सुविज्ञ पाठक महाजुभाव इसके लिये सुमें अपने उदार अन्त:करणसे क्षमा प्रदान करने की कपा करंगे। लगभग १५ वर्ष पूर्व की बात है, जिन दिनों इस गाहस्थ्य चिन्ता युक्त जीवन ने पवित्र विद्यार्थी-जीवन का जासा पहन रक्खा था। जिसमें न कभी सांसारिक-चिंताएँ सताती थीं और न किसी प्रकार का दुःख छोर अशान्ति दी पास्र फटकती थी । अपने झ्ुद्र-साधनों के बल पर एक 'अकिच्वन की बलवती 'आाशाएँ जीवन-संप्राम में विजय प्राप्ति के उपायों पर प्रकाश डाल रददी थीं । वृद्ध जनों के शुभाशीवाद और पूज्य शुरू जनों की महती कृपा से साहित्यालुराग का अंकुर उदूभूत होकर यथासमय विकसित हुआ । उसी विकास काल की उमज्ञ में 'मात भाषा” तथा *वीर बाला” नामक पुस्तिकाओं का प्रादुर्भाव हुआ । यद्यपि सावी समय के गे में अनेक शुभ-भावनाएँ और, सदिच्छाएँ निहित थीं और निकट-भविष्य में उनके सफल दो जाने की पूर्ण झाशा तथा 'असिलाषा थी । किंतु, विश्वेश्वर की गति-विधि में भी किसी का वश 'चल सकता है? हृदय का सारा उत्साह सदइसा बिलीन दो गया। एक के पश्चात्‌ दूसरी 'झापत्ति का 'झाक्रमण प्रारम्भ हुआ जो उत्तरोत्तर चलता गया भर उसी ने झागे चल कर बढ़ा




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