नैषधियाचरितम् | Naisadhiyacharitam (canto 12-22 Uttarardha) Series-52

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Naisadhiyacharitam (canto 12-22 Uttarardha) Series-52 by देवर्षि सनाढ्य - Devrshi Sanadhaya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्र नैपधीयचरितम्‌ सम छौका--' इत्यादिवा पष्ठीप्रतिघेधात्‌ तारा इतति कर्मंणि द्वितीया, सः अ्सर्वेव्यापीत्ययं , अस्य राज्ञ प्रताप एवं तपनः कासा गिरा पार परमाग न गाहते ? सर्वासामप्ति ग्राहते इत्य्थ, ने कासामपि गिरा गोचर जर्भयितुमशवयत्यादिति भाव: । अनोश्ेक्षाउद्धा रद्रपम्‌ ॥ ११॥। अन्वय --ताहग्दी पे विरझिचिवासरविधौ यत्कतँता जातामि, अम्ठेयिपय * चूगोदरे वाडव यत्प्रतिविम्व श्द्धे, व्योमव्यापिविपक्षराजक्यशस्तारा परा” >मावुक अस्य स प्रतापतपन कास्ा ग्रिरा पार न गाइते ? द हिन्दो--उतने बड़े ( चतु्देश मन्वतर परिमाण के ) ब्रह्मा के दिवस के विधान में जिसका कठूँव मैं समझती हूँ, सागर जल के प्रवाहमष्य बडवानलछ को जिसका प्रतिधिम्व समाविद करती हैं, आकाशब्यापी धथुनरेयों के बशोरूप सारकमण को तिरस्कृत करने वाला इस ( ऋतुपर्ण ) का बह प्रतापादित्य किस ( वर्णनकर्त्ता ) क बचनों के परतीर (द्ुमरे तट ) को प्राप्त नही करता 7 4 सब के बचन पार तट की _प्राप्ठ करता है--अर्थात्‌ ऋतुपर्ण के तेजारबि का चर्णेन नही कर सकता )1 सिप्पणी--इस इठो क भे लयोध्यानरेश के क्षात्रतेज को छूर्य कह कर उत्त 4प्रतापतपन” की विशिश्ताओं का सक्केत कर उसकी वर्षनातीतता वतायी शयी है, अर्थात बचना द्वारा ऋतुपर्ण के तेज को कहा नहीं जा सक्रेत्ा | यह प्रताप तसपन सामान्य सूर्य को भाँति चोबीस घंटे के दित राशि का कारण नहीं है अत्युत उत्त विधावा के हिस्तृतवम चतुर्देश मन्वतर परिमाण के अथवा चलुयूंग- सहल्नप्रिमिति दिवस का विधायक है, सागर के जल में प्रतिविम्बित वडवारित उसकी प्रविन्‍्छ'या है तथा आक्राश में व्याप्त वारकगण चहश अपरिमित शर्ु- नरेशों का वियुरू यज्ञ उमके तेज के समुल फोका पड़ जाता है। तात्पयें यह कि इस नरेथ का प्रताप चिरस्वायी है--कल्पान्वावस्थायो। जलू-अग्नि म विरोध है, वे एंक साथ रह नही सत्ते, किन्तु वड़वानल झमुद्रजल में है, यह्‌ इसी कारण है कि वस्तुतन वह अग्नि नहीं, अयोध्वापतति के प्रधापतपन का ब्रतिविम्ब है। ऐसा विह्तक्षण अनल जो पय पूर में मी रह सकता है । अमस्य नरेणा का अपार यथ इसे समुख फ्राका पड़ जाता है 1 मड्लिनाथ के अनुसार यहाँ उत्नेक्षायुगल दै ॥ ११ | है




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