उत्तिष्ठत जाग्रत | Utisthat Jagrat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जाग्रत 11 अन्त में बाध्य होकर उस महापुरुष को स्टेशन पर ही एक खाली बक्से के अन्दर दुबक कर प्रचण्ड शीत लहरी से अपनी रक्षा करनी पड़ी । प्रातः काल जब कार्यालय की खोज में निकले तो सर्वत्र तिरस्कार एवं झिड़कियां मिलनी प्रारम्भ हो गईं । 'काला आदमी' कह कर सभी*अपमान करने लगे । कहीं कही तो लोगों ने दरवाजे बन्द कर दिये। काश ! उन्हें कोई यह बताता कि एक दिन तुम इसी महापुरुष के दर्शनों के लिये इतने व्याकुल होकर दौड़ोगे, कि यह दर- वाजा बन्द करना ही भूल जाओगे। परेशान होकर स्वामी जी सड़क के एक किनारे बैठ गये । ठीक उसी समय सामने के मकान से एक महिला ने आकर पूछा- “महाशय । क्या आप धर्म सभा के प्रतिनिधि हैं?” स्वामी जी बोले--“जी हां ! पर कार्यालय का पता खो जाने से बड़ी विपत्ति में पड़ गया हूँ ।” * वह महिला उसी समय उन्हें अपने घर ले गई। भोजन-विश्राम कराकर धर्म सभा के कार्यालय में ले गई। जहां स्वामी जी को सभा का प्रतिनिधित्व मिल पाया एवं कार्यालय-प्रमुख के द्वारा प्रतिनिधि के साथ रहने की व्यवस्था कर दी गई । वह अमोघ वाणी १ सितम्बर १६६३ विश्व के इतिहास का वह स्वणिम पृष्ठ है जो कभी घुँधल। नहीं हो सकता | प्राच्य और पाश्चात्य: के मिलन का वह शुभ दिवस इतिहास का गौरव है । इसी दिन स्वामी जी द्वारा प्रतिपादित भारत के वेदान्त-धर्म ने विजयी होकर विश्व को आश्चर्य में डाल दिया। हजारों दर्शकों से खचाखच भरे हाल में सभा प्रारम्भ हुई । मंच पर देश-विदेश के सभी धर्मों. के प्रतिनिधि विराजमान थे । सभापति की आज्ञा से सभी प्रतिनिधि अपना-अपना परिचय देकर अपने धर्म का संक्षिप्त सा परिचय देते भौर फिर अपना स्थान ग्रहण कर लेते । अन्त में वारी आयी स्वामी जी की । आध्यात्मिक तेज से जगमगाता दिव्य आनन जैसे ही मंच के ऊपर उभरा, सभा का ध्यान वरबस उधर खिंच गया । पहिले वाक्य ने ही “अमेरिका के बहिनों और. भाइयों'--न जाने कैसा जादू भरा था कि सुनते ही करतल ध्वनि से सभास्थल गूंज उठा | बार-बार प्रयास करने पर भी वह आनन्द की हिलोर शान्त होने का नाम ही न लेती । स्वामी जी का भी प्रयास जब काम न कर सका तो वे भी चुप खड़े हो गये । उन शब्दोंमें निहित विपुल शव्ति एवं भारतीय आत्मा के स्नेह से श्रोताओं का हृदय आत्म विभोर हो उठा जैसे-जैसे स्वामीजी बोलते जाते, श्रोतागण खड़े होते जाते । चारो ओर से बार-बार ऐसी करतल घ्वनि गूंज जाती जो रुकने का नाम ही न लेती | पाश्चात्य जगत के याँत्रिक मानवों के अन्त:करण में क्षण भर के लिये प्रथम बार मानव जाति के एकत्व की अनुभूति उत्पन्त हुईं। स्वामीजी की वाणी में मानव की मानव के प्रति की वेदना बोल रही थी; भारतीय ऋषियों की वाणी झेकृत हो रही थी । रोमा रोलां ने लिखा




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