आहार चिकित्सा | Aahar Chikitsa

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Aahar Chikitsa by सुरेश चतुर्वेदी - Suresh Chaturvedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अवस्था में यदि भोजन किया जाय तो स्‍ग्रामाशय में पराचनक्रिया ठीक प्रवार स नही होती है। यदि ६ घदे बाद बहुत समय तक भोजन न किया जाय तो झशक्वि (कमजोरी) भाती है। जि तु इसका यह भय नही है कि सुबह भोजन करन वे पश्चात सायकाल भूख न भी लगे तो भी भोजन करना ग्रावश्यक है । वास्तव मे भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए। पूव भोजन के पच जाने पर ही खाइय । साघारणत सुबह शाम के भोजन मे झ्राठ घटे का अन्तर रहना चाहिए। दिन में भोजन करना श्रेष्ठ हाता ह बयाकि दिन में समस्त भान डिियो एवं वर्मेदद्रियो की क्ियायें होती रहने से पेट मे गया झ्राहार दूषित नहीं होता । जिन व्यक्तिया को रात को भोजन करना ही पड़े, उह्े रात के पहले सीन घटा मे भांजन वर लेना चाहिए तावि पाचन की तिमा ठीक रहे । रात की दस बजे वे वाद भाजन करना सदा हानिकारक होता है। इससे भ्रपच, क जे, मधुमेह (शुगर) भ्रादि राग हा जाते है। ऋतु के प्रनुसार दिन छोटे व वर हाने के कारण भाजन के समय में छुछ परिवततन क्या जा सकता है । विद्ामिन विटामिन (जीवनीय)-- वाल्य तथा योवनवाल में इन द्वब्या की आवश्यकता सविशेष होती है । प्रधिवाश जीवनीय उद्धिदो में बनते हैं झौर वहा से उहें जो प्राणी लाने है उनके शरीर म श्राते हैं । जीवनीयो के भ्रयोग या हीनयाग से रोग होते ही ह यह कोई नियम नही ह तथापि अनाराग्य के श्रव्ययतत लधण ग्लानि रागो की प्रवत्ति, असम्यक पुष्टि आदि अवश्य हाते हैं। जीवन के प्रारम्भ म इनका समयाग न हो तो जा परिणाम हाते हैं उ'हू श्राग अधिकतम मात्रा मे जीवनीय देवर भी पूरा नही क्या २५




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