श्री मद्भागवत समीक्षा | Shri Madbhagawat Samiksha

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Shri Madbhagawat Samiksha  by छुट्टनलाल स्वामी - Chhuttanlal Swamiतुलसीराम स्वामी - Tulasiram Svami

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ओशइस्‌ अथ प्रथमस्कन्धसमीक्षा “+२+४६2१#<:7<“०५ .._१-प्रथभस्कत्च के आारस्म में कोई “ उवाच » नहीं है, प्रथम जोक सें स्तुति है, दूसरे में लिखा है क्षिः- श्रीमद्वागवते महामुनिकछ्ठते कि वा परेरीखर:। भ्धोत्‌ महामुनि व्यास की बनाई भागवत है ॥ ससीक्षा-इस से प्रतीत होता है कि यह अन्योक्ति है, व्यासोक्ति नहीं ॥ २-श्लोक ३ सें- निगमकल्पतरोगंलितं फल शुकमुखादम्॒तद्गवस युतम्‌ । पिबतभागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुका:॥३॥ अर्थोत्‌ वेद्रूपी कल्पदृक्ष से शुकमुख द्वारा चुवे फल के अमृत की चारा से युक्त ्ञागवतरूप रस का पान करो | यहां क्षागबत बेद्‌ का फ बताया है, -शुकदेव मुनि को तोता कहा है, भला ये श्लोक व्यासकत कैंसे हो सकेंगे जिन [ में व्यास अपने को हो सहामुनि कह कर अन्योक्तिवत्‌ कद्दते हैं ? ३-छ्लोक 9 में भी कहा है किः- यानिवेद॒विदां श्रेष्टी मगवान्वादरायण: । अधे-जो बेद्विदों में श्रेष्ठ व्यास भ्षणवान्‌ ने बनाया है और अन्यों के ' बनाये शासत्र तुसत जानते हो ॥ इस से यह भी व्यांसोक्ति नहीं सिह होती । तथा घच--7 ज्ञोक ६ से ” ऋषयकचुः ? है, “ व्यासडबाद ” है हो नहीं ॥ ३-वािसार- 9. फमनक-+->>तया+न भागवत का कलियुग में बनना भाहात्मय में श्री दर्शा घुके हैं, बहुत से प्रमाण भो देचुके हैं, भत्र शोक १० स्क? १ भी दिखाते हैं। यथा-- ः




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